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21 जून 2021

prathamesh jaju made an amazing picture of moon captures the clearest pic of moon in hindi

प्रथमेश जाजू ने ली चंद्रमा की सबसे विस्तृत, सुंदर और स्पष्ट तस्वीर 


prathamesh jaju made an amazing picture of moon captures the clearest pic of moon in hindi
 clearest pic of moon prathamesh jaju


prathamesh jaju made an amazing picture of moon

पुणे के एक 16 वर्षीय लड़के प्रथमेश जाजू ने चंद्रमा की सबसे विस्तृत, सुंदर और सबसे स्पष्ट तस्वीरों में से एक को कैप्चर किया है। तस्वीर का आकार आपको हैरान कर देगा मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक चांद की बेहद साफ और रंगीन तस्वीरें (clearest pic of moon) क्लिक करने वाले प्रथमेश जाजू  ने करीब 50 हजार से ज्यादा फोटो क्लिक कीं और इस काम में करीब 186 जीबी डेटा इस्तेमाल किया । 

लगभग 50,000 फ़ोटो को (processing) संसाधित करने में उन्हें लगभग 40 घंटे लगे । इस प्रक्रिया के दौरान रॉ डाटा करीब 100 जीबी था और जब आप इसे प्रोसेस किया तो यह डाटा बढ़ गया तो यह करीबन 186 जीबी तक पहुंच गया था। 

जाजू ने बताया कि जब मैंने इन सभी को एक साथ मिलाया तो वह करीबन 600MB तक हो गया था। 3 मई को दोपहर 1 बजे फोटो क्लिक की गई । वीडियो और फोटो के साथ करीब 4 घंटे यह प्रक्रिया चली। इस प्रोसेस में करीबन 38-40 घंटे का समय लगा। इसमें 50 हजार फोटो क्लिक करने के पीछे की वजह चांद की सबसे क्लियर फोटो क्लिक करना था। मैंने इन सभी को एक साथ मिल दिया और चांद की साफ फोटो को तैयार किया।


prathamesh jaju made an amazing picture of moon captures the clearest pic of moon in hindi
Pune young boy prathamesh jaju

 
पुणे के प्रथमेश जाजू, जो अपनी तस्वीर वायरल होने के बाद इंटरनेट सनसनी बन गए, प्रथमेश खुद को "शौकिया खगोलशास्त्री" कहते हैं । जाजू चांद की खींची हुई तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं ।

पुणे के विद्या भवन हाई स्कूल की दसवीं की छात्रा का कहना कि वह किस प्रकार तस्वीर लेते हैं। उन्होंने बताया कि दो अलग-अलग फोटो का एक HDR कंपोसाइट है। इस फोटो को 3- डाइमेंशनल इफेक्ट देने के लिए यह किया गया था। उन्होंने कहा कि यह थर्ड क्वार्टर के मिनरल मून का सबसे क्लियर शॉट है।

प्रथमेश जाजू ने अपनी इस विलक्षण तस्वीर को इंस्टाग्राम पर शेयर किया है और अब लोग इसे खूब पसंद कर रहे हैं। जाजू ने इसे 'एचडीआर लास्ट क्वॉर्टर मिनरल मून' (Last Quarter Mineral HDR Moon Composite) का नाम दिया है।


प्रथमेश पेशेवर रूप से खगोल विज्ञान को अपनाना चाहते हैं। जाजू ने कहा, "मैंने कुछ लेख पढ़े और कुछ YouTube वीडियो देखे मैंने वहां प्रोसेसिंग के बारे में जानकारी इकट्ठा की और इन तस्वीरों को कैप्चर करने के तरीके को समझा । मैं एक खगोल भौतिकीविद् बनना चाहता हूं और पेशेवर रूप से खगोल विज्ञान का अध्ययन करना चाहता हूं, लेकिन अभी मेरे लिए एस्ट्रोफोटोग्राफी सिर्फ एक शौक है।"

मैंने पहली बार चंद्रमा के विभिन्न छोटे क्षेत्रों पर कई वीडियो कैप्चर करके उन्हें कैप्चर किया। प्रत्येक वीडियो में लगभग 2000 फ़्रेम होते हैं, पहले हम उन्हें स्थिर करते हैं, फिर हम प्रत्येक वीडियो को एक छवि में मर्ज और स्टैक करते हैं। इसलिए मैंने लगभग 38 वीडियो लिए। अब हमारे पास 38 चित्र हैं। हम उनमें से प्रत्येक को मैन्युअल रूप से तेज करते हैं और फिर उन्हें फ़ोटोशॉप में एक बड़े मोज़ेक की तरह एक साथ सिलाई करते हैं। एक बार मोज़ेक हो जाने के बाद, कुछ और समायोजन किए जाते हैं और कुछ अंतिम टच-अप और बूम! 


छवि के लिए उनके इंस्टाग्राम कैप्शन में से एक के अनुसार, जाजू ने कहा कि उन्होंने फोटो लेते समय Celestron 5 Cassegrain OTA (टेलीस्कोप), एक ZWO ASI120MC-S सुपर-स्पीड USB कैमरा का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने रंगों के लिए कैनन EOS 90D (APS-C CMOS सेंसर के साथ) स्काईवॉचर 8 ”कोलैप्सिबल रिफ्लेक्टर डोबसनियन का इस्तेमाल किया। 

विस्तृत पोस्ट-प्रोसेसिंग के लिए, जाजू ने PIPP, Autostakkert, IMPPG, Registax 6, Adobe Photoshop और Lightroom जैसे सॉफ़्टवेयर का उपयोग किया। जबकि छवि में चंद्रमा का रंग असामान्य प्रतीत होता है, जाजू के अनुसार, रंग चंद्रमा पर खनिजों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिन्हें हमारी आंखें नहीं बल्कि डीएसएलआर कैमरे और अन्य विशिष्ट कैमरे स्पष्ट करते हैं।

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03 जून 2020

LUNAR ECLIPSE 2020

LUNAR ECLIPSE 2020

चंद्रग्रहण 2020 

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LUNAR ECLIPSE 
यह वर्ष 2020 खगोलीय घटनाओं में रूचि रखने वालों के लिए बेहद ख़ास है क्योंकि इस वर्ष हमें कई चंद्रग्रहण और सूर्य ग्रहण देखने को मिलेगा | वर्ष 2020 में चार चंद्र ग्रहण हैं- एक जनवरी में हुआ था और बाकी जून, जुलाई और नवंबर में लगने वाले हैं. 5 जून को होने वाला चंद्रग्रहण उपच्छाया होगा. इसका अर्थ है कि चांद, पृथ्वी की हल्की छाया से होकर गुजरेगा वर्ष 2020 में पहला चंद्रग्रहण 10 जनवरी को लगा था| और अब दुसरा चंद्रग्रहण 5 जून को लगने जा रहा है जो कि उपच्छाया चंद्रग्रहण होगा | जिसकी शुरुआत 5 जून की रात 11:16 बजे से प्रारंभ होकर 6 जून 2:32 मीनट तक रहेगा | ग्रहण रात 12:54 बजे अपने अधितम प्रभाव में होगा | जून में ही 21 तारीख को सूर्य ग्रहण भी लगेगा खास बात ये है कि ये दोनों ही ग्रहण भारत में दिखाई देगा यह ग्रहण भारत सहित एशिया, अफ्रीका, यूरोप और आस्ट्रेलिया के लोग देख पाएंगे |


चंद्रग्रहण (Lunar Eclipse) किसे कहते हैं ?

जिस तरह से सूर्य का अपना प्रकाश होता है उस तरह से चंद्रमा का अपना प्रकाश नहीं होता है वो सूर्य के परावर्तित प्रकाश से चमकता है मतलब जब भी हम चंद्रमा को देखते है और उसका जितना भाग हमें चमकता हुआ नजर आता है उतने भाग पर सूर्य का प्रकाश पड़ रहा होता है| इसी प्रक्रिया में जब पृथ्वी, सूर्य और चन्द्रमा के बीच आ जाती है तो चन्द्रमा पर पड़ने वाला सूर्य का प्रकाश पृथ्वी की छाया से ढक जाता है इसी खगोलीय घटना को चन्द्रग्रहण कहा जाता है | दुसरे शब्दों में कहें तो जब सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक सीधी रेखा में संरेखित होते हैं तो हम पृथ्वी की स्थिति के आधार पर सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण देखते हैं | चंद्र ग्रहण उस वक्त लगता है जब पूरा चांद निकला हुआ हो और पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाए | इस तरह सूर्य की किरणों को सीधे चंद्रमा तक नहीं पहुंच पाती हैं | यह तभी होता है जब पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा दोनों के बीच आ जाए |

चंद्र ग्रहण तीन प्रकार के होते हैं-
(1) पूर्ण   (2)आंशिक (3) उपच्छाया

चंद्रग्रहण को कैसे देखें ?


चंद्रग्रहण को कैसे देख सकेंगे चंद्रग्रहण को देखने के लिए किसी विशेष साधन की आवश्यकता नही होती है आप इसे नंगी आखों से भी देख सकते है | लेकिन यह एक उपच्छाया चंद्रग्रहण है इसलिए अगर आप टेलिस्कोप की सहायत से अगर इस ग्रहण को देखेंगे तो ये और भी शानदार नजर आएगा | उपच्छाया चंद्रग्रहण कोई केवल टेलिस्कोप से ही देखा जा सकता है क्योंकि उपच्छाया चंद्रग्रहण में चंद्रमा कि धुंधली सी परत नजर आती है | इस घटना में चंद्रमा के आकार में कोई फर्क नजर नहीं आता है |


सूर्य ग्रहण (Solar Eclipse)

सूर्यग्रहण भी एक खगोलीय घटना है | चांद के पृथ्वी और सूर्य के बीच आने के कारण सूर्यग्रहण होता है | इस दौरान चांद की छाया धरती पर पड़ती है और जिस जगह पर यह छाया पड़ती है वहां आंशिक रूप से अंधेरा हो जाता है | इसी घटना को सूर्यग्रहण कहा जाता है ऐसे में सूर्य को नंगी आंखों से नहीं देखना चाहिए |

चंद्र ग्रहण की तरह सूर्य ग्रहण भी तीन तरह के होते हैं-
(1) पूर्ण   (2)आंशिक (3) उपच्छाया


जून में ही लगेगा वर्ष का पहला सूर्यग्रहण 

जून में साल का तीसरा ग्रहण और साल का पहला सूर्यग्रहण लगने जा रहा है इस ग्रहण को भारत में देखा जा सकेगा | 21 जून को सूर्य ग्रहण सुबह 9बजकर15 मीनट पर शुरू होगा और दोपहर 3 बजकर 4 मीनट पर खत्म होगा | इस दौरान फुल एक्लिप्स 10बजकर17मीनट पर शुरू होगा और 2बजकर2 मीनट पर खत्म होगा |

14 मई 2020

INDIAN NAVIGATION SYSTEM



INDIAN NAVIGATION SYSTEM (NAVIC)

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दोस्तों हमारा देश भारत क्षेत्रफल कि दृष्टी से दुनिया का सातवाँ बड़ा देश है, इसके वृहद् क्षेत्र ,जलवायु विभिन्नता, कई तरह की  स्थालाकृतियाँ और भोगौलिक बनावट, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं भाषाई विविधतता की दृष्टी से इसे उपमहाद्वीप की संज्ञा दी जाती है| इसके इतने विशाल स्वरुप  का अध्ययन,सुरक्षा,मौसम, जलवायु,सामरिक हलचल, संचार, परिवहन इत्यादि आवश्यकताओं की दृष्टि से इसका अपना जीपीएस या यूँ कहें कि अपना कोई नेविगेसन सिस्टम नहीं होने के कारण हमें दूसरे देश जैसे कि अमेरिका के जीपीएस पर आश्रित रहना पड़ता था | जिसका परिणाम हमने मई 1999 में देखा था जब पाकिस्तानी सेनिक घुसपैठिये की तरह कश्मीर में घुस गए और कारगिल की कई पहाड़ियों पर उन्होंने कब्जा जमा लिया था| ऐसे हालत में हमारी सेना को घुसपैठियों का सही लोकेशन पता लगाने में काफी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था और जब हमारी सरकार ने अमेरिका से जीपीएस के द्वारा घुसपैठियों की जानकारी माँगी  तो अमेरिका ने भारत के उम्मीदों पर पानी फेरते हुए भारत की सहायता करने से मना कर दिया| इसके बावजूद भी हमारा देश युद्ध जीत गया और इस मुश्किल वक़्त में अमेरिका के दोहरे चरित्र को भी भारत ने देख लिया | इस अमेरिकी असहयोग से भारत ने सबक हासिल किया और अपनी नैविगेसन प्रणाली बनाने पर काम करना शुरू कर दिया | और आज उसी का परिणाम है कि भारत अपनी नैविगेशन प्रणाली बनाने वाले चंद देशों में शामिल है| जिसे भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो (Indian Space Research Organization - ISRO) ने बनाया है| नाविक एक तरह से RPS (Regional Navigation System) है| नाविक प्रणाली का पहला उपग्रह आई.आर.एन.एस.एस.-1 01 जुलाई, 2013 को प्रक्षेपित किया गया. और इस प्रणाली का आखिरी उपग्रह यानी आई.आर.एन.एस.एस.-1आई 12 अप्रैल, 2018 को पी.एस.एल.वी.-सी41 द्वारा स्थापित किया गया | आज यह नैविगेसन प्रणाली शुरू हो चुकी है |

GPS और  RPS में अंतर-

GPS (जीपीएस)- इसका पूरा नाम Global Positioning System है यह अमेरिकी अंतरिक्ष विज्ञान संस्था नासा द्वारा विकसित उपग्रह पर आधारित नैविगेसन प्रणाली है जिसका उपयोग हम आमतौर पर अपने मोबाइल में गूगल मेप के माध्यम से अपनी या किसी स्थान कि लोकेसन पता करने, अपनी लोकेशन से किसी दूसरी लोकेशन की दूरी पता करने के लिए करते हैं| इन कार्यों के अतिरिक्त जीपीएस से और भी कई तरह के कार्य किये जाते हैं, यह कम से कम 24 उपग्रहों से बना है। GPS किसी भी मौसम में 24 घंटे काम करता है |

RPS (आरपीएस)- इसका पूरा नाम रीजनल पोजिशनिंग सिस्टम(Regional Navigation System) है| भारत द्वारा बनाया गए नैविगेसन प्रणाली को हम जीपीएस कि श्रेणी में नहीं रख सकते क्योंकि यह सिर्फ भारत के ऊपर ही काम करेगा| इसके लिए ISRO ने 8 सैटेलाइट पृथ्वी की कक्षा में भारत के ऊपर स्थापित किये हैं जिसमे 07 सैटेलाइट नेविगेशन के लिए हैं और 01 सैटेलाइट मैसेजिंग के लिए है| इनका पूरा नाम है - इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (IRNSS) था जिसको बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सैटेलाइट सिस्टम का नाम भारत के मछुवारों को समर्पित करते हुए नाविक रखा है| नाविक यानि कि नैविगेशन इंडियन कॉन्स्टेलशन (NAVIC) इससे भारत में कहीं भी आपको जीपीएस से बेहतर नेवीगेशन मिलेगा साथ ही देश की सीमाओं से 1500 किमी बाहर तक का सटीक पोजिशनिंग पता चल पाएगा| जीपीएस पुरे वैश्विक स्तर पर कार्य करता है जबकि RPS का क्षेत्र सीमित होता है|  


भारत के अलावा इन देशों के पास है अपना खुद का नैविगेसन सिस्टम-

दुनिया में कुछ ही ऐसे देश हैं जिनके पास अपना खुद का नैविगेसन सिस्टम हैं| जिनमे अमेरिका के पास जीपीएस(24 सैटेलाइट) है, रूस के पास ग्लोनास(24 सैटेलाइट), भारत के पास नाविक(8 सैटेलाइट),यूरोप का गैलीलियो(26 सैटेलाइट), चीन का बीडाउ(30 सैटेलाइट) | इनमें से यूरोप के गैलीलियो और चीन के बीडाउ ने काम करना शुरू नहीं किया है इस तरह हम कह सकते हैं कि भारत इस नैविगेसन सिस्टम को प्राप्त करने वाला विश्व का तीसरा देश बन चूका है|

नाविक के उपग्रह- 

IRNSA यानी 'Indian Regional Navigation Satellite System जिसे हम नाविक के नाम से भी जानते है इसमें कुल 8 सैटेलाइट हैं जिनमें 7 नैविगेसन के लिए है जो कि हर समय दक्षिण एशिया में 1500 किमी के दायरे में नजर रखेंगे और 1 उपग्रह मेसेंजिंग के लिए है| इसमें 4 उपग्रह भूसमकालिक कक्षा में और 4 उपग्रह भू-स्थिर कक्षा में स्थापित किये गए हैं|  भूस्थिर कक्षा पृथ्वी से 35786 किमी ऊंचाई पर स्थित वह कक्षा है, जहां स्थित उपग्रह पृथ्वी से हमेशा एक ही स्थान पर दिखाई देता है| इसरो ने आईआरएनएसएस के उपग्रहों के कुल 9 प्रक्षेपण किये जिनमें से 1 प्रक्षेपण आईआरएनएसएस-1H (IRNSS-1H) 31 अगस्त 2017 असफल रहा|


जीपीएस और नाविक में बेहतर कौन ?

अमेरिकी जीपीएस के 24 उपग्रह पूरे विश्व के लिए अंतरिक्ष में फैले हुए हैं, और आईआरएनएसएस के केवल 7+1(मैसेजिंग ) उपग्रह भारत और उसके पड़ोसी देशों को कवर कर रहे हैं जीपीएस और नाविक में ज्यादा बेहतर नाविक है क्योंकि नाविक में एस और एल बैंड कि दोहरी आवृति है इसलिए यह जीपीएस से सटीक होगा, जीपीएस के मुकाबले शहरी इलाकों में नाविक की सटीकता छह गुना अधिक होगी। जबकी जीपीएस केवल एल बैंड पर आधारित है| इससे उसे कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है| जब कम आवृत्ति वाले संकेत वायुमंडल में यात्रा करते हैं, तो इसके वेग में बदलाव हो जाता है. इस कारण इस मॉडल को इसे समय-समय पर अपडेट करना पड़ता है| वहीं नाविक के मामले में दोहरी आवृत्ति (एस और एल बैंड) की देरी में अंतर को मापा जा सकता है और वास्तविक देरी का आकलन किया जा सकता है. इस प्रकार आवृत्ति त्रुटि खोजने के लिए नाविक किसी भी प्रकार से किसी भी मॉडल पर निर्भर नहीं है और ये जीपीएस से अधिक सटीक है|

जाने कैसे फोटो का बैकग्राउंड चेंज करें:-

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नाविक का उपयोग-


नाविक का उपयोग से हम अपने स्मार्ट फ़ोन और अपने वाहनों अपनी स्थिति और रास्तों कि जानकारी ज्यादा सटीकता के साथ पता कर सकेंगे |
युद्ध के समय इस सिस्टम से हथियारों को सटीकता से संचालित करना, दुश्मन देश की सेना का पता लगाने में | युद्ध के समय हम इसका उपयोग निर्बाध रूप से कर सकेंगे
NAVIC से हमें जमीन, वायु और जल तीनों पर रास्ता आसानी से पता चलेगा. साथ ही आपदा प्रबंधन में मदद मिलेगी |
नाविक से मैपिंग, भूगर्भीय डाटा कैप्चर करने, ड्राइवरों के लिए दृश्य और आवाज नेविगेशन के अलावा वाहन ट्रैकिंग और बेड़े प्रबंधन में भी मददगार साबित होगा|
इसका उपयोग किसी सैन्य मिशन पर, हथियारों की आवाजाही और मिसाइल छोड़ने या उसे नैविगेट करने के लिए किया जा सकेगा |

दोस्तों नाविक का इस्तेमाल पुराने स्मार्ट फोन पर नहीं किया जा सकेगा| इसका उपयोग नाविक नैविगेशन प्रणाली लगी चिप युक्त स्मार्ट फोन एवं अन्य डिवाइसों में ही किया जा सकेगा |

01 मई 2020

WORLD ASTRONOMY DAY

खगोल विज्ञान दिवस (ASTRONOMY DAY)

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खगोल विज्ञान किसे कहते हैं ?


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WORLD ASTRONOMY DAY

खगोल का अर्थ आकाशमंडल होता  है| खगोल शास्त्र, एक ऐसा शास्त्र है जिसके अंतर्गत पृथ्वी और उसके वायुमण्डल के बाहर होने वाली घटनाओं का अवलोकन, विश्लेषण तथा उसकी व्याख्या (explanation) की जाती है। यह वह अनुशासन है जो आकाश में अवलोकित की जा सकने वाली तथा उनका समावेश करने वाली क्रियाओं के आरंभ, बदलाव और भौतिक तथा रासायनिक गुणों का अध्ययन करता है। खगोलिकी ब्रह्मांड में अवस्थित आकाशीय पिंडों का प्रकाश, उद्भव, संरचना और उनके व्यवहार का अध्ययन खगोलिकी का विषय है। अब तक ब्रह्मांड के जितने भाग का पता चला है उसमें लगभग 19 अरब आकाश गंगाओं के होने का अनुमान है और प्रत्येक आकाश गंगा में लगभग 10 अरब तारे हैं। आकाश गंगा का व्यास लगभग एक लाख प्रकाशवर्ष है। हमारी पृथ्वी पर आदिम जीव 2 अरब साल पहले पैदा हुआ और आदमी का धरती पर अवतण 10-20 लाख साल पहले हुआ। पश्चिमी संस्कृति में गैलीलियो नामक खगोल विज्ञानी को आधुनिक खगोलशास्त्र का पिता माना जाता है। हालाँकि कुछ लोग यह नाम कॉपरनिकस को देते हैं।



खगोल विज्ञान दिवस




खगोल विज्ञान को अंग्रेजी में  ASTRONOMY कहा जाता है तथा इसे ज्योतिषी शास्त्र में (नक्षत्र विद्या) भी कहा जाता है वर्ल्ड एस्ट्रोनॉमी डे या विश्व खगोल विज्ञान दिवस प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला इवेंट है जिसे दुनिया भर में बसंत और पतझड़ के मौसम में वर्ष में दो बार मनाया जाता है | इस बार 2 मई और 26 सितम्बर को ये मनाया जायेगा | एस्ट्रोनॉमी डे को मनाने के पीछे उद्देश्य आम जनता को खगोल विज्ञान से परिचय करवाना, खगोल विज्ञान के महत्व को जन-जन तक पहुँचाना है इसके अंतर्गत सामान्य लोग, शौकिया खगोल शास्त्री,  अंतरिक्ष विज्ञान में दिलचस्पी रखने वाले  लोग मिलते हैं और अंतरिक्ष विज्ञान के रोचक और अनोखे प्रयोग करते हैं |


खगोल विज्ञान में रूचि रखने वालों के लिए आभासी टेलिस्कोप के 

दवारा ब्रह्माण्ड का दर्शन किया जा सकता है


वर्ल्ड एस्ट्रोनॉमी डे का इतिहास – History of World Astronomy


वर्ल्ड एस्ट्रोनॉमी डे विश्व खगोल विज्ञान दिवस की शुरुआत सन 1973 में कैलीफोर्निया अमेरिका में हुई| इसकी शुरुआत एस्टॉनोमिकल एसोसिएशन  आफ नार्थन कैलिफोर्निया के अध्यक्ष Doug Berger ने  की थी, उन्होंने सोचा की अंतरिक्ष विज्ञान में दिलचस्पी रखने वाले  सभी लोग अंतरिक्ष वेधशाला तक सफर करके नहीं जा सकते इसके लिए छोटे-छोटे टेलीस्कोप्स उनके शहर में ही उपलब्ध कराए जाने चाहिए जिससे वह वर्ष में दो बार आकाश का अध्ययन कर सकें इसके लिए उन्होंने शहरों, शॉपिंग मॉल्स गली के कोनो आदि में छोटे-छोटे टेलीस्कोप लगवाए| उनका यह आइडिया काम कर गया,  लोगों ने वर्ल्ड एस्ट्रोनॉमी डे में काफी दिलचस्पी दिखाई,  पहले जिन लोगों ने टेलीस्कोप से आकाश का अध्ययन नहीं किया था उन्होंने भी इसका उपयोग किया और उनकी दिलचस्पी से बढ़ गई,  अब यह लोग जानना चाहते थे कि ऑब्जर्वेटरी में लगे बड़े बड़े टेलिस्कोप से आकाश किस प्रकार दिखाई देता है इसके लिए उन्होंने सबसे पास स्थित ऑब्जर्वेटरी में जाना शुरू किया इससे जनता की भीड़ एस्ट्रोनॉमी क्लब और एस्ट्रोनॉमी ऑब्जर्वेट्रीज में आने लगी| अमेरिका में सफल होने के बाद इस कांसेप्ट को दुनिया के दूसरे देशों में भी अपना लिया गया दुनिया भर में स्कूल, कॉलेज तथा एस्ट्रोनॉमी क्लब प्रतिवर्ष दो बार एस्ट्रोनॉमी डे  पर कई इवेंट आयोजित करते हैं |

06 अप्रैल 2020

SUPER PINK MOON 2020 | सुपरमून क्या है


सुपरमून- पृथ्वी के सबसे ज्यादा नजदीक होगा चंद्रमा

सुपरमून अर्थात चन्द्रमा का विशेष रूप से बड़े पैमाने पर दिखाना | ये प्राकृतिक घटना एक बार फिर से घटित होने जा रहा है। आपको बता दें कि 8 अप्रैल को साल 2020 का सुपरमून (SuperMoon) दिखाई देगा। यह साल का सबसे चमकदार और बड़ा सुपरमून होगा। अप्रैल में पूर्णिमा को गुलाबी चंद्रमा या पिंकमून (PinkMoon) भी कहा जाता है। बता दें कि इसे सुपरमून इसलिए भी कहा जाएगा क्योंकि यह पूर्णिमा वाले दिन दिखने वाला सुपरमून होगा। पूर्णिमा का चाँद वैसे भी पूरा होने से बड़ा दिखाई देता है सुपरमून कि घटना में चन्द्रमा सामान्य से 14 प्रतिशत ज्यादा बड़ा और 30% ज्यादा चमकदार होता है |

SUPERMOON
MOON PERIGEE AND APOGEE
जानिए क्या है SUPERMOON

       दोस्तों सुपरमून एक खगोलीय घटना है, जिसमें चंद्रमा, पृथ्वी के सबसे नजदीकी स्थिति में आ जाता है। चंद्रमा का पृथ्वी के नजदीक होने की वजह से यह बहुत बड़ा और चमकदार दिखाई देता है। इस महीने के सुपरमून को पृ्थ्वी से 3,56,907 किलोमीटर दूर बताया जा रहा है। हमेशा इन दोनों के बीच की औसत दूरी 384,400 किलोमीटर होती है। वहीं कुछ एक्सपर्ट का मानना है कि ऐसा बिल्कुल जरूरी नहीं है कि पूर्णिमा एक सुपरमून ही हो, क्योंकि पृथ्वी के चारों ओर चंद्रमा अंडाकार कक्षा में घूमता है। चंद्रमा हमे पूरा तब भी दिखाई दे सकता है, जब वो हमारे ग्रह यानी पृथ्वी से ज्यादा दूरी पर हो। लेकिन इस बार ऐसा माना जा रहा है कि 8 अप्रैल को दिखाई देने वाला सुपरमून इस साल का सबसे बड़ा और सबसे चमकीला सुपरमून होगा।
PINK SUPERMOON
PINK SUPERMOON

 क्यों दिखता है चाँद बड़ा ?

        मालूम हो कि पृथ्वी की कक्षा में घूमते हुए चंद्रमा जब धरती के सबसे नजदीक आ जाता है तो उस स्थिति को 'पेरीजी' और कक्षा में जब सबसे दूर होता है तो उस स्थिति को 'अपोजी' कहते हैं8 अप्रैल  2020 को चांद 'पेरीजी' होगा और इस कारण वो बड़ा दिखाई देगा

MOON PERIGEE AND APOGEE
MOON PERIGEE AND APOGEE
दिए गए हैं ये नाम-

        इस साल जनवरी में दिखाई दिए सुपरमून को Wolf Moon कहा गया था तो वहीं फरवरी में इसे Snow Moon और मार्च में दिखे सुपरमून को Worm Moon नाम दिया गया था और अब अप्रैल में दिखाई देने वाले इस सुपरमून को पिंक मून नाम दिया गया है। मई में दिखाई देने वाले सुपरमून को Flower Moon, जून में दिखने वाले सुपरमून को Strawberry Moon और जुलाई में दिखाई देने वाले सुपरमू को Buck Moon नाम दिया गया है।

आगामी सुपेरमून कब दिखाई देगा                  

                   आने वाले वर्षों में हमें ये प्राकृतिक घटना निम्नलिखित तिथियों को देखने को मिलेंगे -

2020
Monday,         9 March
2020
Wednesday,   8 April
2021
Tuesday,        27 April
2021
Wednesday,   26 May
2022
Tuesday,        14 June
2022
Thursday,       14 July

क्यों कहा गया PINKMOON

        आपको बता दें इसको पिंक मून का मतलब ये बिल्कुल नहीं कि इस दिन चंद्रमा गुलाबी रंग का दिखाई देगाबल्कि ये नाम एक गुलाबी फूल (Phlox Subulata) से पड़ा है। जो वसंत के मौसम में उत्तर अमेरिका के पूर्व में खिलता है।
Phlox_subulata_Pink
क्या भारत में SUPERMOON का दीदार होगा ?
         भारतीय समयानुसार 8 अप्रैल को सुपरमून सुबह 8.05 पर दिखाई देगा, ऐसे में भारत में लोगों को ये घटना आसमान में दिखाई नहीं देगी, क्योंकि यहां दिन का उजाला होगा। इसलिए ऑनलाइन वेबसाइटों पर जाकर आप सुपरमून को लाइव देख सकते हैं |

      दोस्तों जानकारी अच्छी लगी हो तो कमेंट में अपनी प्रतिक्रिया दें एवं दोस्तों में शेयर करें | जय हिन्द जय भारत 

Annual report of work done for environmental protection in the school

  विद्यालय में पर्यावरण संरक्षण के लिए किए जाने वाले कार्यों की वार्षिक रिपोर्ट -  अपने विद्यालय में पर्यावरण संरक्षण के लिए किए जाने वाले क...