SHAYARI लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
SHAYARI लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

04 सितंबर 2021

Mujhko bulane walon ki umre nikal gai Lekin main tere ek ishare pe aagaya

मुझको बुलाने वालों कि उम्रें निकल गई लेकिन मैं तेरे एक इशारे पे आ गया 

https://humariduniyakijaankari.blogspot.com/
shayar munawwar rana



दरिया को जोम था कि मैं धारे पे आ गया

लेकिन मैं बच-बचा के किनारे पे आ गया


मुझको बुलाने वालों कि उम्रें निकल गई

लेकिन मैं तेरे एक इशारे पे आ गया


उसका तमाम हुश्न हमारी नज़र में है

कश्मीर सारा एक शिकारे पे आ गया


साँसों कि दूर टूट भी जाए तो गम नहीं

शुक्रे खुदा, मैं आखिरी पारे पे आ गया


इसे भी पढ़ें-  ग़ालिब जिसे कहते हैं उर्दू का ही शायर था 


Dariya ko zom tha ki main dhare pe aagya

Lekin main bach-bacha ke kinare pe aagaya.


Mujhko bulane walon ki umra nikal gayi

Lekin main tere ek ishare pe aagaya.


Uska tamam husna hamari nazer mai hai

Kashmir saara ek shikare pe aagaya.


Saason ki dor toot bhi jaye to gum nahin

Shukre - Khuda, main aakhiri paare pe aagaya




poem on teachers day in hindi

गुरु पर दोहे

https://humariduniyakijaankari.blogspot.com/


गुरु मन में बैठत सदा, गुरु है भ्रम का काल ।

गुरु अवगुण को मेटता, मिटें सभी भ्रमजाल ।।




गीली मिट्टी अनगढ़ी, हमको गुरुवर जान ।

ज्ञान प्रकाशित कीजिये, आप समर्थ बलवान ।।




यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान ।

शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान ।।



गुरु बिन ज्ञान न होत है, गुरु बिन दिशा अजान ।

गुरु बिन इंद्रिय न सधें, गुरु बिन बढ़े न शान ।।



इसे भी पढ़ें- साइलेंट स्प्रिंग पुस्तक का सारांश 


गुरु ग्रंथ का सार है, गुरु है प्रभु का नाम ।

गुरु अध्यात्म की ज्योति, गुरु है चारों धाम ।।




शिष्य वही जो सीख ले, गुरु का ज्ञान अगाध ।

भक्तिभाव मन में रखे, चलता चले अबाध ।।



गुरु अमृत है जगत में, बाकी सब विषबेल ।

सतगुरु संत अनंत हैं, प्रभु से कर दें मेल ।




अंधकार से खींचकर, मन में भरे प्रकाश ।

ज्यों मैली चुनरी धुले, सोहत तन के पास ।।


इसे भी पढ़ें- ये बादशाह का हुक्म है और एक हुक्म ये भी है 


गुरु की कृपा हो शिष्य पर, पूरन हों सब काम ।

गुरु की सेवा करत ही, मिले ब्रह्म का धाम ।।




गुरु अनंत तक जानिए, गुरु की ओर न छोर ।

गुरु प्रकाश का पुंज है, निशा बाद का भोर ।।




गुरु तेरे उपकार का, कैसे चुकाऊं मैं मोल ।

लाख कीमती धन भला, गुरु हैं मेरे अनमोल ।।




गुरु कुम्हार शिष्य कुंभ है, गढ़ि – गढ़ि काढ़ै खोट ।

अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट ।।


इसे भी पढ़ें- इंजीनियर्स डे क्यों मनाया जाता है 


गुरु को सिर रखिये, चलिए आज्ञा माहिं ।

कहे कबीर ता दास को, तीन लोकों भय नाहिं ।।




गुरु सो ज्ञान जु लीजिये, सीस दीजिये दान ।

बहुतक भोंदू बहि गए, सखि जीव अभिमान ।।




सब धरती कागज करूँ, लेखनी सब बनराय ।

सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा ना जाए ।।




गुरु गोविन्द दोउ खड़े, काके लागूं पाय ।

बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय ।।


31 जुलाई 2021

ghalib jise kahte hain urdu ka hi shayar tha urdu pe sitam dha kar ghalib pe karam kyon hai

ग़ालिब जिसे कहते हैं उर्दू ही का शायर था


ghalib jise kahte hain urdu ka hi shayar tha urdu pe sitam dha kar ghalib pe karam kyon hai
sahir ludhianvi

जहां तक उर्दू का सवाल है, हम एक महत्त्वपूर्ण घटना का जिक्र करके उर्दुभाषियों की बेचैनी और उनके दर्द को पाठकों के सामने रखना चाहेंगे। बढ़ती दूरियां, गहराती दरार नामक अपनी पुस्तक में रफ़ीक़ जकारिया ने एक घटना का हवाला देते लिखा है, '1969 में फखरुद्दीन अली अहमद भारत सरकार को इस बात पर राजी करने में कामयाब हो गये कि मिर्ज़ा ग़ालिब की जन्म शताब्दी अखिल भारतीय स्तर पर मनायी जाये। परिणामस्वरूप, बंबई में एक विशाल आम समारोह आयोजित किया गया।। केंद्र और राज्य के अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने समारोह में हिस्सा लिया। उसमें भाग लेने वाले प्रमुख उर्दू लेखकों और शायरों में लोकप्रिय साहिर लुधियानवी भी थे। जब शांत, विनम्र साहिर अपने सामान्य गंभीर व्यक्तित्व के साथ अपनी रचना पढ़ने के लिए खड़े हुए तो तालियों की प्रचंड गड़गड़ाहट हुई, सभी ने बड़ी उम्मीद के साथ सुनना शुरू किया कि अब उर्दू कविता के शिखरपुरुष से मिर्ज़ा ग़ालिब को श्रद्धांजलि अर्पित करने वाली मार्मिक रचना सुनने को मिलेगी। लेकिन जब साहिर ने रचना पढ़नी शुरू की और पंक्ति दर पंक्ति पढ़ते गये तो सभी दंग रह गये, मंच पर बैठे मंत्री, अधिकारी धक् रह गये और विशाल जनसमुदाय उछल पड़ा। साहिर ने सुनाया 


इसे भी पढ़े- तू भी राणा का बेटा है फेंक जहाँ तक भाला जाए |



इक्कीस बरस गुज़रे आज़ादी-ए-कामिल को,

तब जाके कहीं हम को ग़ालिब का ख़्याल आया ।

तुर्बत है कहाँ उसकी, मसकन था कहाँ उसका,

अब अपने सुख़न परवर ज़हनों में सवाल आया ।

सौ साल से जो तुर्बत चादर को तरसती थी,

अब उस पे अक़ीदत के फूलों की नुमाइश है ।

उर्दू के ताल्लुक से कुछ भेद नहीं खुलता,

यह जश्न, यह हंगामा, ख़िदमत है कि साज़िश है ।

जिन शहरों में गुज़री थी, ग़ालिब की नवा बरसों,

उन शहरों में अब उर्दू बे नाम-ओ-निशां ठहरी ।

आज़ादी-ए-कामिल का ऎलान हुआ जिस दिन,

मातूब जुबां ठहरी, गद्दार जुबां ठहरी ।

जिस अहद-ए-सियासत ने यह ज़िन्दा जुबां कुचली,

उस अहद-ए-सियासत को मरहूमों का ग़म क्यों है ।

ग़ालिब जिसे कहते हैं उर्दू ही का शायर था,

उर्दू पे सितम ढा कर ग़ालिब पे करम क्यों है ।

ये जश्न ये हंगामे, दिलचस्प खिलौने हैं,

कुछ लोगों की कोशिश है, कुछ लोग बहल जाएँ ।

जो वादा-ए-फ़रदा, पर अब टल नहीं सकते हैं,

मुमकिन है कि कुछ अर्सा, इस जश्न पर टल जाएँ ।

यह जश्न मुबारक हो, पर यह भी सदाकत है,

हम लोग हक़ीकत के अहसास से आरी हैं ।

गांधी हो कि ग़ालिब हो, इन्साफ़ की नज़रों में,

हम दोनों के क़ातिल हैं, दोनों के पुजारी हैं

19 मई 2021

tere hote janam liya hota Koi Mujhsa Na Dusara Hota naat lyrics in hindi

तेरे होते जन्म लिया होता,  कोई मुझसा न दूसरा होता 

tere hote janam liya hota lyrics in hindi


तेरे होते जन्म लिया होता

कोई मुझसा न दूसरा होता


सांस लेता तू और मैं जी उठता

काश मक्का की मैं फिजा होता


हिजरतों में पड़ाव होता मैं

और तू कुछ देर को रुका होता

तेरे हुजरे के आस-पास कहीं

मैं कोई कच्चा रास्ता होता


बीच ताईफ बवक्ते संग जनी

तेरे लब पे सजी दुआ होता


किसी गजवा में जख्मी होकर मैं

तेरे क़दमों में जा गिरा होता


काश उहद में शरीक हो सकता

और बाक़ी न फिर बचा होता


तेरे पाकीज़ा ज़िन्दगी का मैं

कोई गुमनाम वाकिया होता


मैं कोई जंगजू-ए-अरब होता

और तेरे सामने झुका होता


मैं भी होता तेरा ग़ुलाम कोई

लाख कहता न मैं रिहा होता


सोचता हूँ मैं तब जन्म लेता

जाने फिर क्या से क्या हुआ होता

चाँद होता तेरे ज़माने का

फिर तेरे हुक्म से बटा होता


मुझपे पड़ती जो तेरी नजरे करम

आदमी क्या मैं मौजजा होता


आसमाँ होता अहदे नबवी का

तुझको हैरत से देखता होता


पेड़ होता खजूर का मैं कोई

जिस का फल तूने खा लिया होता


बच्चा होता ग़रीब बेवा का

सर तेरी गोद में छिपा लिया होता


रास्ता होता तेरे गुजरने का

और तेरा रास्ता देखता होता


बूत ही होता मैं खाने क़ाबा में

जो तेरे हाथ से फ़ना होता


मुझको खालिक बनता गार हसन

और मेरा नाम भी हिरा होता

तेरे होते जन्म लिया होता 

कोई मुझसा न दूसरा होता




Tere Hote Janam Liya Hota,

Koi Mujhsa Na Dusara Hota ..




Saans Leta Tu Aur Main Jee Uth'ta,

Kaash Makkah Ki Main Fiza Hota ..




Hijraton Mein Padao Hota Main,

Aur Tu Khuchh Der Ko Ruka Hota ..



Tere Hujray Ke Aass Pass Kahin,

Main Koi Kachcha Rastaa Hota ..




Beech Taif Bawaqt E Sang-Zani,

Tere Lab Pe Saji Dua Hota ..




Kisi Ghazwa Mein Zakhmi Ho Ker Main,

Tere Qadmon Mein Jaa Gira Hota ..



Kaash Uhad Mein Shareeq Ho Sakta,

Aur Baaqi Na Phir Bacha Hota ..



Teri Pakeeza Zindagi Ka Main,

Koi Gumnaam Waqeyaa Hota ..




Main Koi Jang-Juu E Arab Hota,

Aur Tere Saamnay Jhuka Hota ..




Main Bhi Hota Tera Ghulam Koi,

Laakh Kehta, Na Main Riha Hota ..




Sochta Hun Main Tab Janam Leta,

Jane fir Kya Se Kya Hua Hota ..



Chaand Hota Tere Zamanay Ka,

fir Tere Hukam Se Bata Hota ..



Mujh Pe Padti Jo Teri Chashm E Karam,

Aadmi Kya .. Main Maujzaa Hota ..



Asman Hota Ehad E Nabwi Ka,

Tujh Ko Hairat Se Dekhta Hota ..



Ped Hota Khajoor Ka Main Koi,

Jiss Ka fal Tu Ne Kha Liya Hota ..



Bachcha Hota Ghareeb Bewa Ka,

Sar Teri God Mein Chupa Liya Hota ..



Rasta Hota Tere Guzarne Ka,

Aur Tera Raasta Dekhta Hota ..




But Hi Hota Mein Khana E Kaaba Mein,

Jo Tere Haath Se Fana Hota ..




Mujh Ko Khaaliq Banata Ghaar 'Hassan'

Aur Mera Naam Bhi Hiraa Hota ..



Terey Hote Janam Liya Hota, 

Koi Mujhsa Na Dusra Hota .. !!

18 मई 2021

ye badshah ka hukm hai aur ek hukm ye bhi hai image par kavita

ये बादशाह का हुक्म है और एक हुक्म ये भी है, मेरे लिए जो है सजी वो सेज न ख़राब हो 


ye badshah ka hukm hai aur ek hukm ye bhi hai image par kavita


तुम्हारी अर्थियां उठे मगर ये ध्यान में रहे

मेरे लिए जो है सजी वो सेज न ख़राब हो

ये बादशाह का हुक्म है, और एक हुक्म ये भी है

भले कोई मरे मेरी इमेज न ख़राब हो



सुनो मेरे मंत्रियों सफेदपोश संत्रियों

जहाँ मिले जमीन खली रोप दो कपास तुम

कपास मिल में डाल कर बुनो सफ़ेद चादरें

गली गली में जाकर के फिर ढको हर एक लाश तुम

सवाल जो करे उसे नरक में तब तलक रखो

कहे न जब तलक मुझे कि आप लाजवाब हो

ये बादशाह का हुक्म है, और एक हुक्म ये भी है

भले कोई मरे मेरी इमेज न ख़राब हो

इसे भी पढ़ें- कब तक बोझ संभाला जाए द्वन्द कहाँ तक पाला जाए तू भी राणा का 


खरीदो ड्रोन कैमरें खीचाऑ मेरी फोटोएं

दिखाओ उसको न्यूज पे करो मेरा प्रचार फुल

कहीं दिखे दाग़ तो ज़बान से ही पोछ दो

मगर ये ध्यान में रहे ज़बान में हो लार फुल

निकाल रीढ़ हर किसी भीड़ वो बनाओ तुम

हो जुल्म बेहिसाब पर कभी न इंक़लाब हो

ये बादशाह का हुक्म है, और एक हुक्म ये भी है

भले कोई मरे मेरी इमेज न ख़राब हो



जो सत्य है वो ही दिखे न लाग न लपेट हो

न कोई पेड न्यूज़ हो न झूट का प्रचार हो

काट दे जो जुल्म को जो चीर दे अनर्थ को

वो पत्रकार के कलम में ऐसे तेजधार हो

सलाख डाल कर , निकाल कर उछाल दो उसे

किसी की आँख में अगर ये बेहुदा सा ख्वाब हो

ये बादशाह का हुक्म है, और एक हुक्म ये भी है

भले कोई मरे मेरी इमेज न ख़राब हो


पुनीत शर्मा

21 अप्रैल 2021

kab tak bojh sambhala jaye tu bhi rana ka vansaj hai fenk jahan tak bhala jaye kavi wahid ali wahid ki kavita

कब तक बोझ संभाला जाए, द्वंद्व कहां तक पाला जाए






लखनऊ के मशहूर कवि वाहिद अली वाहिद (59 वर्ष) का मंगलवार 20 अप्रैल को निधन हो गया । उन्हें तीन दिन से उन्हें बुखार था। इलाज के लिए उन्हें लोहिया अस्पताल ले जाया गया लेकिन न तो उन्हें स्ट्रेचर मिला न ही भर्ती किया गया । आखिरकार इलाज के अभाव में वाहिद ने इस फानी दुनिया को अलविदा कह दिया।

kab tak bojh sambhala jaye tu bhi rana ka vansaj hai fek jahan tak bhala jaye kavi wahid ali wahid ki kavita
kavi wahid ali wahid


कवि वाहिद अली वाहिद लखनऊ के निवासी थें । वे मूल रूप से कुशीनगर के रहने वाले थे, वे आवास विकास लखनऊ में कार्यरत थे । उनकी दर्जनभर से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और उन्हें कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित भी किया गया था । 

आज हम आपके बीच उन्हीं की प्रसिद्द कविता शेयर कर रहे हैं |



कब तक बोझ संभाला जाए

द्वंद्व कहां तक पाला जाए


दूध छीन बच्चों के मुख से

क्यों नागों को पाला जाए


दोनों ओर लिखा हो भारत

सिक्का वही उछाला जाए


तू भी है राणा का वंशज

फेंक जहां तक भाला जाए


इस बिगड़ैल पड़ोसी को तो

फिर शीशे में ढाला जाए


तेरे मेरे दिल पर ताला

राम करें ये ताला जाए


वाहिद के घर दीप जले तो

मंदिर तलक उजाला जाए


कब तक बोझ संभाला जाए

युद्ध कहां तक टाला जाए


तू भी राणा का वंशज है 

फेंक जहां तक भाला जाए

इसे भी पढ़ें- मैं इश्क लिखूं तुझे हो जाये 




Kab tak bojh sambhala jaye

Dwand kahan tak pala jaye



Doodh chhin bachchon ke mukh se

Kyon naagon ko pala jaye



Dono aur likha ho bharat

Sikka wahi uchhala jaye


Tu bhi rana ka vansaj hai

Fenk jahan tak bhala jaye



Is bigdel padosi ko to

Fir sheeshe me dhala jaye



Tere mere dil par tala

Ram kare ye tala jaye



Wahid ke ghar deep jale to

Mandir tak ujaala jaye



Kab tak bojh sambhala jaye

Yuddh kahan tak tala jaye



Tu bhi rana ka vansaj hai 

27 मार्च 2021

we musalman the devi prasad mishra ki kavita

वे मुसलमान थे 


we musalmaan the devi prasad mishra ki kavita

कवि देवी प्रसाद मिश्र



वे मुसलमान थे

कहते हैं वे विपत्ति की तरह आए
कहते हैं वे प्रदूषण की तरह फैले
वे व्याधि थे

ब्राह्मण कहते थे वे मलेच्छ थे

वे मुसलमान थे

उन्होंने अपने घोड़े सिन्धु में उतारे
और पुकारते रहे हिन्दू! हिन्दू!! हिन्दू!!!

बड़ी जाति को उन्होंने बड़ा नाम दिया
नदी का नाम दिया

वे हर गहरी और अविरल नदी को
पार करना चाहते थे

वे मुसलमान थे लेकिन वे भी
यदि कबीर की समझदारी का सहारा लिया जाए तो
हिन्दुओं की तरह पैदा होते थे

उनके पास बड़ी-बड़ी कहानियाँ थीं
चलने की
ठहरने की
पिटने की
और मृत्यु की

प्रतिपक्षी के ख़ून में घुटनों तक
और अपने ख़ून में कन्धों तक
वे डूबे होते थे

उनकी मुट्ठियों में घोड़ों की लगामें
और म्यानों में सभ्यता के
नक्शे होते थे

न! मृत्यु के लिए नहीं
वे मृत्यु के लिए युद्ध नहीं लड़ते थे

वे मुसलमान थे

वे फ़ारस से आए
तूरान से आए
समरकन्द, फ़रग़ना, सीस्तान से आए
तुर्किस्तान से आए

वे बहुत दूर से आए
फिर भी वे पृथ्वी के ही कुछ हिस्सों से आए
वे आए क्योंकि वे आ सकते थे

वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे कि या ख़ुदा उनकी शक्लें
आदमियों से मिलती थीं हूबहू
हूबहू

वे महत्त्वपूर्ण अप्रवासी थे
क्योंकि उनके पास दुख की स्मृतियाँ थीं

वे घोड़ों के साथ सोते थे
और चट्टानों पर वीर्य बिख़ेर देते थे
निर्माण के लिए वे बेचैन थे

वे मुसलमान थे

यदि सच को सच की तरह कहा जा सकता है
तो सच को सच की तरह सुना जाना चाहिए

कि वे प्रायः इस तरह होते थे
कि प्रायः पता ही नहीं लगता था
कि वे मुसलमान थे या नहीं थे

वे मुसलमान थे

वे न होते तो लखनऊ न होता
आधा इलाहाबाद न होता
मेहराबें न होतीं, गुम्बद न होता
आदाब न होता

मीर मक़दूम मोमिन न होते
शबाना न होती

वे न होते तो उपमहाद्वीप के संगीत को सुननेवाला ख़ुसरो न होता
वे न होते तो पूरे देश के गुस्से से बेचैन होनेवाला कबीर न होता
वे न होते तो भारतीय उपमहाद्वीप के दुख को कहनेवाला ग़ालिब न होता

मुसलमान न होते तो अट्ठारह सौ सत्तावन न होता

वे थे तो चचा हसन थे
वे थे तो पतंगों से रंगीन होते आसमान थे
वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे और हिन्दुस्तान में थे
और उनके रिश्तेदार पाकिस्तान में थे

वे सोचते थे कि काश वे एक बार पाकिस्तान जा सकते
वे सोचते थे और सोचकर डरते थे

इमरान ख़ान को देखकर वे ख़ुश होते थे
वे ख़ुश होते थे और ख़ुश होकर डरते थे

वे जितना पी०ए०सी० के सिपाही से डरते थे
उतना ही राम से
वे मुरादाबाद से डरते थे
वे मेरठ से डरते थे
वे भागलपुर से डरते थे
वे अकड़ते थे लेकिन डरते थे

वे पवित्र रंगों से डरते थे
वे अपने मुसलमान होने से डरते थे

वे फ़िलीस्तीनी नहीं थे लेकिन अपने घर को लेकर घर में
देश को लेकर देश में
ख़ुद को लेकर आश्वस्त नहीं थे

वे उखड़ा-उखड़ा राग-द्वेष थे
वे मुसलमान थे

वे कपड़े बुनते थे
वे कपड़े सिलते थे
वे ताले बनाते थे
वे बक्से बनाते थे
उनके श्रम की आवाज़ें
पूरे शहर में गूँजती रहती थीं

वे शहर के बाहर रहते थे

वे मुसलमान थे लेकिन दमिश्क उनका शहर नहीं था
वे मुसलमान थे अरब का पैट्रोल उनका नहीं था
वे दज़ला का नहीं यमुना का पानी पीते थे

वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे इसलिए बचके निकलते थे
वे मुसलमान थे इसलिए कुछ कहते थे तो हिचकते थे
देश के ज़्यादातर अख़बार यह कहते थे
कि मुसलमान के कारण ही कर्फ़्यू लगते हैं
कर्फ़्यू लगते थे और एक के बाद दूसरे हादसे की
ख़बरें आती थीं

उनकी औरतें
बिना दहाड़ मारे पछाड़ें खाती थीं
बच्चे दीवारों से चिपके रहते थे
वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे इसलिए
जंग लगे तालों की तरह वे खुलते नहीं थे

वे अगर पाँच बार नमाज़ पढ़ते थे
तो उससे कई गुना ज़्यादा बार
सिर पटकते थे
वे मुसलमान थे

वे पूछना चाहते थे कि इस लालकिले का हम क्या करें
वे पूछना चाहते थे कि इस हुमायूं के मक़बरे का हम क्या करें
हम क्या करें इस मस्जिद का जिसका नाम
कुव्वत-उल-इस्लाम है
इस्लाम की ताक़त है

अदरक की तरह वे बहुत कड़वे थे
वे मुसलमान थे

वे सोचते थे कि कहीं और चले जाएँ
लेकिन नहीं जा सकते थे
वे सोचते थे यहीं रह जाएँ
तो नहीं रह सकते थे
वे आधा जिबह बकरे की तरह तकलीफ़ के झटके महसूस करते थे

वे मुसलमान थे इसलिए
तूफ़ान में फँसे जहाज़ के मुसाफ़िरों की तरह
एक दूसरे को भींचे रहते थे

कुछ लोगों ने यह बहस चलाई थी कि
उन्हें फेंका जाए तो
किस समुद्र में फेंका जाए
बहस यह थी
कि उन्हें धकेला जाए
तो किस पहाड़ से धकेला जाए

वे मुसलमान थे लेकिन वे चींटियाँ नहीं थे
वे मुसलमान थे वे चूजे नहीं थे

सावधान!
सिन्धु के दक्षिण में
सैंकड़ों सालों की नागरिकता के बाद
मिट्टी के ढेले नहीं थे वे

वे चट्टान और ऊन की तरह सच थे
वे सिन्धु और हिन्दुकुश की तरह सच थे
सच को जिस तरह भी समझा जा सकता हो
उस तरह वे सच थे
वे सभ्यता का अनिवार्य नियम थे
वे मुसलमान थे अफ़वाह नहीं थे

वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे


डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

08 जनवरी 2021

main ishq likhun tujhe ho jaye lyrics in hindi

chal aa ik aisi nazm kahun jo lafz kahoon wo ho jaye

चल आ इक ऐसी नज़्म कहूँ, जो लफ्ज़ कहूँ वो हो जाए


main ishq likhun tujhe ho jaye lyrics in hindi
ishq in arabic calligraphy




चल आ इक ऐसी ''नज़्म'' कहूं,
जो ''लफ़्ज़'' कहूं वो हो जाए..
मैं ''अश्क'' कहूं तो इक आंसू ,
तेरे गोरे ''गाल'' को धो जाए..


मैं ''आ'' लिखूं तो आ जाए,
मैं ''बैठ'' लिखूं तो आ बैठे..
मेरे ''शाने'' पर सर रखे तो,
मैं ''नींद'' कहूं तो सो जाए..


मैं काग़ज़ पर तेरे ''होंठ'' लिखूं ,
तेरे ''होठों'' पर मुस्कान आए..
मैं ''दिल'' लिखूं तू दिल थामे,
मैं ''गुम'' लिखूं वो खो जाए..


तेरे ''हाथ'' बनाऊं पेंसिल से,
फिर ''हाथ'' पे तेरे हाथ रखूं..
कुछ ''उल्टा-सीधा'' फ़र्ज़ करूं
कुछ ''सीधा-उल्टा'' हो जाए..


मैं ''आह'' लिखूं तो हाए करे,
''बेचैन'' लिखूं बेचैन हो तू ..
फिर मैं बेचैन का ''बे'' काटूं ,
तुझे ''चैन'' ज़रा सा हो जाए..


अभी ''ऐन'' लिखूं तू सोचे मुझे,
फिर ''शीन'' लिखूं तेरी नींद उड़े..
जब ''क़ाफ़'' लिखूं तुझे कुछ-कुछ हो,
मैं ''इश्क़'' लिखूं तुझे हो जाए


....आमिर अमीर

20 नवंबर 2020

sinhasan hil uthe rajvanshon ne bhukati tani thi khub ladi mardani wo to jhansi wali rani thi

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भूकुटी तानी थी


sinhasan hil uthe rajvanshon ne bhukti tani thi khub ladi mardani wo to jhansi wali rani thi
https://en.wikipedia.org/


खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी


सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने  भूकुटी तानी थी,

बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,

गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,

दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

 

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,

लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,

नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,

बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।

 

वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,

देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,

नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,

सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़।

 

महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,

ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,

राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,

सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आई थी झांसी में।

 

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,

किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,

तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,

रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

 

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।


इसे भी पढ़ें :- बार- बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी - सुभद्रा कुमारी चौहान  


बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,

राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,

फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,

लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।

 

अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,

व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,

डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,

राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।

 

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,

कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,

उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात?

जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।

 

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

रानी रोईं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,

उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,

सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,

'नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'

 

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।


इसे भी पढ़ें :- ias interview questions and answers in hindi


कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,

वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,

नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,

बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।

 

हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,

यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,

झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,

मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी,

 

जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,

नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,

अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,

भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।

 

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,

जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,

लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,

रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में।

 

ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,

घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,

यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,

विजई रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।

 

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

इसे भी पढ़ें :- राजीव गाँधी खेल रत्न प्राप्त खिलाडियों की सूचि  


विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,

अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,

काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,

युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

 

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,

किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,

घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,

रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।

 

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,

मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,

अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,

हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता-नारी थी,

 

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,

यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,

होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,

हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।


तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।


सुभद्रा कुमारी चौहान 

Annual report of work done for environmental protection in the school

  विद्यालय में पर्यावरण संरक्षण के लिए किए जाने वाले कार्यों की वार्षिक रिपोर्ट -  अपने विद्यालय में पर्यावरण संरक्षण के लिए किए जाने वाले क...