06 मई 2020

MOTHER'S DAY

MOTHER'S DAY


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माँ, एक ऐसा शब्द जिसमें सुकून भी है, राहत भी, ममता भी है मोहब्बत भी  हर दर्द कि पहली सदा है माँ, हर जख्म कि असरकारक दवा है माँ, माँ है तो घर में रौनक है, घर जन्नत है| माँ रब कि सब से खुबसूरत कृति है दुनिया में माँ से बढ़कर अज़ीम शख्सियत और कोई नहीं है | क्योंकि हम को इस जहाँ में लाने से पहले वो हमें अपने सिकम [पेट] में 9 माह तक महफूज रखती है वो सोते जागते हर पल हमारी हरकतों को महसूस करती है हमारी परवाह करती है अगर कुछ घंटे हमने सिकम में हरकत जो न कि थी कभी वो हो  उठती थी बेचैन उसकी धड़कने बढ़ जाती थी इस ख्याल से कि मेरे बच्चे को क्या हो गया और फिर जब हमने मारा था लात उस के पेट पर तो उसकी जान में जैसे जान आई गई हो | ये ऐसी चोट थी जिसको महसूस कर उसे उस पल दुनिया कि सबसे बड़ी ख़ुशी मिली थी | क्योंकि माँ के लिए उसकी जान उसका जहा उसका बच्चा ही होता है जिसे वो हर हाल में सलामत और खुश देखना चाहती है माँ को हर लम्हा अपने बच्चों कि फिक्र हुआ करती है माँ कि दुआ बच्चों के साथ साथ चलती है |
         माँ का प्यार अपने बच्चे के लिये कभी कम नहीं होता है माँ अपने हर बच्चे से बेंइन्तहा प्यार करती है खुदा ने माँ के सीने में ममता का वो नूर रौशन फ़रमाया है जो मरते दम तक अपने बच्चों की ज़िन्दगी से ग़म के अँधेरों को दूर कर खुशियों कि रौशनी करती है | जिस किसी की माँ होती है वो शख्स दुनिया में बहुत खुसनसीब होता है | जिनके हिस्से में माँ का प्यार नहीं होता, सर पर माँ का आंचल नहीं होता वो सेहरा में पानी और साये कि तलाश में के तड़पते भटकते हुए शख्स कि तरह होता है|
        माँ अपने बच्चों के लिए कई किरदार निभाती है कभी वो ज़िन्दगी कि पहली शिक्षिका बनकर हमें नैतिकता का पाठ पढ़ाती है हमें सही और गलत का भेद बताती है| तो कभी वो दोस्त बनकर हमारे साथ खेलती है| ऐसा लगता है जैसे माँ का अपना कोई जीवन नहीं होता उसका हर पल, हर लम्हा, हर सोच अपने बच्चों को समर्पित होता है वो अपने बच्चों के बचपन में अपना बचपन देखती है, माँ हर किरदार निभा सकती है, पर माँ का किरदार कोई नहीं निभा सकता है| बस इसी समर्पण के लिए एक संतान होने के नाते हम माँ के लिए जीतना भी करें उतना ही कम है हम माँ के कर्ज को कभी भी अदा नही कर सकते| माँ के सम्मान में कोई एक दिन सेलिब्रेट कर हम अपने दायित्वों से बरी नहीं हो सकते बल्कि हमें माँ का सम्मान हर दिन हर पल करना होगा| तभी सही मायनों में माँ का सम्मान हो सकता है |

कैसे हुई मदर्स डे की शुरुआत?


मां को सम्मान देने वाले इस दिन की शुरुआत अमेरिका से हुई | अमेरिकन एक्टिविस्ट एना जार्विस अपनी मां से बहुत प्यार करती थीं | उन्होंने न कभी शादी की और न कोई बच्चा था| वो हमेशा अपनी मां के साथ रहीं| वहीं, मां की मौत होने के बाद प्यार जताने के लिए उन्होंने इस दिन की शुरुआत की| फिर धीरे-धीरे कई देशों में मदर्स डे (Mother's Day) मनाया जाने लगा | 


कब और कैसे मनाया जाता है मदर्स डे?

           9 मई 1914 को अमेरिकी प्रेसिडेंट वुड्रो विल्सन ने एक लॉ पास किया था जिसमें लिखा था कि मई महीने के हर दूसरे रविवार को मदर्स डे (Mother's Day) मनाया जाएगा, जिसके बाद मदर्स डे अमेरिका, भारत और कई देशों में मई महीने के दूसरे रविवार को मनाया जाने लगा | इस बार मदर्स डे 10 मई 2020 को है |
       वैसे तो मां को प्यार करने और तोहफे देने के लिए किसी खास दिन की जरुरत नहीं, लेकिन फिर भी मदर्स डे (Mother's Day) के दिन मां को और सम्मान दिया जाता है| उन्हें तोहफे, मीठा और ढेर सारा प्यार किया जाता है | यह दिन मां के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर उनके दिए गए अथाह प्यार और स्नेह के लिए धन्यवाद देने का एक माध्यम है ।

मदर्स डे पर क्या करें-


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मदर्स डे पर आप सबसे पहले अपने आप को खुश रखिये और किसी भी तरह के तनाव से बचे क्यों अगर आप तनाव या टेंसन में होंगे तो आप कि माँ इस तनाव को भांप लेंगी और वो भी तनाव में आ जाएगी जिससे मदर्स डेका सारा उत्साह और रंग बेरंग हो जायेगा|


1.सुबह सवेरे उठ कर माँ का पैर छूकर प्रणाम करें, उनका आशीर्वाद लें और उनको मदर्स डेविश करें 2. माँ को कम से कम एक फूल, अपने हाथ से बना कार्ड या ग्रींटिंग कार्ड जरुर दें |
3. आज सारा दिन माँ के साथ गुजारें |
4. फूल और कार्ड देकर माँ के हाथों को चूमे |
5. माँ के लिए आज माँ की पसंद का कोई पकवान बनाये या फिर आर्डर करें |
6. आज माँ को अपने हाथ से खाना खिलाएं |

7. हम सब जानते हैं कि दुनिया में सिर्फ मां की जॉब ही ऐसी है, जिसमें कभी कोई छुट्टी नहीं होती, 8. कोई संडे नहीं होता। इस मदर्स डे (mother's day in hindi) आप अपनी मां को पूरे एक दिन का आराम दे सकते हैं और बना सकते है उनके लिए इस दिन को खास |
9. Mother's Day के दिन आप अपनी मां के दोस्तों को बुला सकते हैं, जिनसे आपकी मां को मिले अरसे बीत गए हों और वो उनको याद करती हों। दोस्तों के साथ पूरा दिन बिताने का मौका, ये भी उनके लिए एक अच्छा गिफ्ट साबित हो सकता है। 

10. बचपन की फोटो एल्बम अगर हो तो माँ के साथ देखें और उस फोटो से संबंधित बातों को माँ से पूछें |
11. सभी भाई बहन एक गोल घेरा बना कर उसके बीच में माँ को खड़ा कर माँ पर आधारित कोई गीत, कविता गाएं |
12. माँ की अगर कोई पुरानी ब्लेक एंड वाइट फोटो हो तो उसे कलर करा कर फोटो फ्रेम करा कर माँ को अर्पित करें |
13. या फिर पुरानी फोटो को कलेक्ट कर उनका एक प्यारा सा एल्बम बना कर दें | आप उनकी बचपन से लेकर अब तक की सभी फोटोज़ को उसमें लगा सकते हैं, जैसे जब वो छोटी थीं, जब उन्होंने पहली बार अपना बर्थडे मनाया था, जब उनकी शादी हुई थी और जब वे पहली बार मां बनी थीं। हो सकता है कि ये सब इकट्ठा करना थोड़ा मुश्किल हो लेकिन मां के लिए इतना तो कुछ भी नहीं है।
14. माँ को बाहर कहीं घुमाने ले जाएँ, साथ में खाना खाएं, शापिंग करें, उनकी पसंद का सामान खरीदें 
15. माँ को लेट नाइट डिनर, मूवी या फिर लॉन्ग ड्राइव पर ले जा सकते हैं।
16. जब अपने मां से अपनी पसंद का सामान खरीदने की डिमांड की होगी। क्यों न इस बार उनकी पसंद का कुछ खरीद लिया जाए। मदर्स डे गिफ्ट (best mother's day gifts) कुछ ऐसा हो जिन्हें देखकर वो बस खुश हो जाएं।
17. अगर आप कि माँ को ज्वेलरी पंसंद है तो आप उन्हें एक खुबसूरत रिंग या इयररिंग भी गिफ्ट दे सकते हैं |
18. आप अपनी मदर को कॉफी और चाय का मग भी दे सकते हैं। इसमें खासकर अपनी और अपनी मां की तस्वीरें भी प्रिंट करवा सकते हैं। 


दोस्तों भले ही मदर्स डे साल में एक बार आता है | लेकिन हमें माँ का सम्मान हर दिन हर वक़्त करना चाहिए उनकी बातों को सुनना,समझना और मानना चाहिए उनका ध्यान रखना चाहिए | उनके साथ समय व्यतीत करना चाहिये उनकी परेशानियों को दूर करना हमारा दायित्व है उनकी जरूरतों को पूरा करना हमारा फ़र्ज़ है |हमें उनकी सेहत का ख़ास ख्याल रखना चाहिए | हमें हर रोज मदर्स डे की तरह मानना चाहिए, हर दिन हम गिफ्ट दें या न दें कम से कम मुस्कुराकर माँ कि तरफ देख तो सकते हैं यकीन मानिए माँ इसी से खुश हो जाएगी |

RABINDRANATH TAGOR

RABINDRANATH TAGOR

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RABINDRANATH TAGORE
जन्म- 

रबींद्रनाथ टैगोर का जन्म देवेन्द्रनाथ टैगोर और शारदा देवी के सन्तान के रूप में 7 मई, 1861 को कोलकाता के जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी में हुआ था। बचपन में उन्‍हें प्‍यार से 'रबी' बुलाया जाता था | रबीन्द्रनाथ टैगोर, श्री देवेन्द्रनाथ टैगोर के सबसे छोटे पुत्र थे। रबींद्रनाथ टैगोर के भाई और बहन के नाम- द्विजेन्द्र नाथ, ज्योतिन्द्र नाथ, सत्येन्द्रनाथ, स्वर्णकुमारी था |


विवाह 

टैगोर का विवाह 9 दिसंबर1883 को म्रणालिनी देवी से हुआ | जिनसे रबीन्द्रनाथ टैगोर के पांच बच्चे हुए जिनके नाम इस प्रकार है- रेणुका टैगोर, शमिंद्रनाथ टैगोर, मीरा टैगोर, रथिंद्रनाथ टैगोर, माधुरिलता टैगोर इनमें से दो की मृत्यु बाल्यावस्था में हो गया था |

रबींद्रनाथ टैगोर की पहली कविता-


रबींद्रनाथ टैगोर ने महज आठ वर्ष की उम्र में ही ‘’भानुसिंहेर पदावली’ नामक अपनी पहली कविता लिखी खेलने कूदने के उम्र में रवीन्द्र कविता और लघु कहानी लिखने में व्यस्त रहते थे  रबींद्रनाथ टैगोर ने  1877 ई० में सोलह साल की उम्र में कहानी और नाटक लिखना प्रारंभ कर दिया था | आगे चलकर टैगोर एक महान कवि, उपन्यासकार, कहानीकार, राष्ट्रवादी, दार्शनिक व शिक्षाविद होने के साथ-साथ एक उत्कृष्ट संगीतकार और पेंटर भी साबित हुए | पिता के ब्रह्म-समाजी के होने के कारण वे भी ब्रह्म-समाजी थे। परन्तु अपनी रचनाओं व कर्म के द्वारा उन्होंने सनातन धर्म को भी आगे बढ़ाया। रबींद्रनाथ टैगोर उन साहित्य सर्जकों में हैं, जिन्हें काल की परिधि में नहीं बाँधा जा सकता। रचनाओं के परिमाण की दृष्टि से भी कम ही लेखक उनकी बराबरी कर सकते हैं उन्होंने एक हजार से भी अधिक कविताएँ लिखीं और दो हज़ार से भी अधिक गीतों की रचना की। रविन्द्र संगीत, बाँग्ला संस्कृति का अभिन्न अंग है।  इनके अलावा उन्होंने बहुत-सारी कहानियाँ, उपन्यास, नाटक तथा धर्म, शिक्षा, दर्शन, राजनीति और साहित्यजैसे विविध विषयों से संबंधित निबंध लिखे।

शिक्षा –


समृद्ध परिवार में जन्म लेने के कारण  रबींद्रनाथ का बचपन बड़े आराम से बीता। पर विद्यालय का उनका अनुभव एक दुःस्वप्न के समान रहा जिसके कारण भविष्य में उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाने के लिए अभूतपूर्व प्रयास किए। कुछ माह तक वे कलकत्ता में ओरिएण्टल सेमेनरी में पढ़े पर उन्हें यहाँ का वातावरण बिल्कुल पसंद नहीं आया। इसके उपरांत उनका प्रवेश नार्मल स्कूल में कराया गया। यहाँ का उनका अनुभव और कटु रहा। विद्यालयी जीवन के इन कटु अनुभवों को याद करते हुए उन्होंने बाद में लिखा जब मैं स्कूल भेजा गया तो, मैने महसूस किया कि मेरी अपनी दुनिया मेरे सामने से हटा दी गई है। उसकी जगह लकड़ी के बेंच तथा सीधी दीवारें मुझे अपनी अंधी आखों से घूर रही है। इसीलिए जीवन पर्यन्त गुरूदेव विद्यालय को बच्चों की प्रकृति, रूचि एवं आवश्यकता के अनुरूप बनाने के प्रयास में लगे रहे। इस प्रकार  रबींद्रनाथ को औपचारिक विद्यालयी शिक्षा नाममात्र की मिली। पर घर में ही उन्होंने संस्कृत, बंगला, अंग्रेजी, संगीत, चित्रकला आदि की श्रेष्ठ शिक्षा निजी अध्यापकों से प्राप्त की।  | टैगोर जन्म से ही, बहुत ज्ञानी थे, इनके पिता प्रारंभ से ही, समाज के लिये समर्पित थे | इसलिये वह  | जी को भी, बैरिस्टर बनाना चाहते थे | जबकि, उनकी रूचि साहित्य में थी,  | जी के पिता ने 1878 में उनका लंदन के विश्वविद्यालय मे दाखिला कराया परन्तु, बैरिस्टर की पढ़ाई मे रूचि न होने के कारण 1880 मे वे बिना डिग्री लिये ही वापस आ गये |

रबींद्रनाथ टैगोर और आइंस्टाइन


आइंस्टाइन जैसे महान वैज्ञानिक, श्री  रबींद्रनाथ टैगोर को ‘‘रब्बी टैगोर’’ के नाम से पुकारते थे। हिब्रू भाषा में ‘‘रब्बी’’ का अर्थ होता है ‘‘मेरे गुरू’’। यहूदी धर्म गुरू को भी ‘‘रब्बी’’ कहा जाता है। आइंस्टाइन और गुरू रविन्द्रनाथ टैगोर के बीच हुए पत्र व्यवहार में ‘‘रब्बी टैगोर’’ का साक्ष्य मिलता है। श्री  रबींद्रनाथ ठाकुर से अल्बर्ट आइंस्टाइन की मुलाकात सम्भवतः तीन बार हुई। यह तीनों मुलाकात अलग-अलग समय में बर्लिन में हुई थी। सर्वप्रथम टैगोर जी ने ही गाँधी जी को महात्मा कहकर पुकारा था। और नेताजी सुभाषचन्द्र बोस रविन्द्रनाथ टैगोर के कहने पर ही गाँधी जी से मिले थे। 1919 में हुए जलियाँवाला काँड की  रबींद्रनाथ ठाकुर ने निंदा करते हुए विरोध स्वरूप अपना सर का खिताब वाइसराय को लौटा दिया था। रबीन्द्रनाथ टैगोर का वैश्विक मंच पर मानवता का मूल्य निर्धारण करने वाला सार्वभौमिक विचार आज भी विचारणीय है |


रबींद्रनाथ टैगोर और नोबेल पुरस्कार -


रबींद्रनाथ टैगोर द्वारा लिख गई गीतांजली नामक कविता के लिए इन्हें साल 1913 में नोबेल पुरस्कार मिला था। जिसके साथ ही वे भारतीय मूल के और एशिया के पहले ऐसे व्यक्ति बन गए थे जिन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। गीतांजली लोगों को इतनी पंसद आई कि उनकी इस कृति का कई भाषाओँ में अनुवाद किया गया टैगोर का नाम दुनिया के कोने कोने में फ़ैल गया और वे विश्व पटल पर स्थापित हो गए | वहीं साल 1915 में इन्हें अंग्रेजो द्वारा सरकी उपाधि भी दी गई थी। रबींद्रनाथ टैगोर दुनिया के संभवत: एकमात्र ऐसे कवि हैं, जिनकी रचनाओं को दो देशों ने अपना राष्ट्रगान बनाया। (1) भारत का राष्ट्र-गान जन गण मन जिसकी रचना 1911ई० में की (2) बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान आमार सोनार यह एक लंबी कविता की शुरूआती 10 लाइनें हैं. इसे 1905 में बंगाल के पहले विभाजन के समय लिखा गया था | 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान इसे बतौर राष्ट्रगान स्वीकार कर लिया गया |

सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ : -

जीवित और मृत, क्षुधित पाषाण, नष्टनीड़, समाज का शिकार, भिखारिन, काबुलीवाला, पाषाणी, रामकन्हाई की मूर्खता, दीदी, माल्यदान, चोरी का धन, रासमणि का बेटा, विद्रोही, मुन्ने की वापसी, कंकाल।) आदि कहानी संग्रह।
काव्य कृतियाँ :-.

गीतांजलि, रवीन्द्रनाथ की कविताएँ, कालमृगया, मायार खेला।

नाट्य कृतियाँ:- 

राजा ओ रानी, विसर्जन, डाकघर, नटीरपूजा, रक्तकरबी (लाल कनेर), अचलायतन, शापमोचन, चिरकुमार सभा, चित्रांगदा, मुकुट, प्रायश्चित्त, शारदोत्सव,फाल्गुनी, चण्डालिका, श्यामा।

रवींद्रनाथ टैगोर ने लौटा दी थी 'नाइट हुड' की उपाधि-


रबींद्रनाथ टैगोर ने अंग्रेजी हुकुमत का विरोध करते हुए अपनी 'सर' की उपाधि वापस लौटा दी थी | उन्होंने यह उपाधि विश्व के सबसे बड़े नरसंहारों में से एक जलियांवाला कांड (1919) की घोर निंदा करते हुए लौटाई थी | 13 अप्रैल 1919 में पंजाब के अमृतसर में हुए जलियाँवाला हत्याकाँड का रबींद्रनाथ ठाकुर ने निंदा करते हुए विरोध स्वरूप अपना ‘सर’ का खिताब वाइसराय को लौटा दिया था। उन्होंने कहा कि उनके लिए नाइटहुड का कोई मतलब नहीं था, जब अंग्रेजों ने अपने साथी भारतीयों को मनुष्यों के रूप में मानना भी जरूरी नहीं समझा।


रबींद्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित शिक्षण संस्थान-


शान्ति निकेतन-  1901 में रबींद्रनाथ टैगोर ने ब्रह्मचर्य आश्रम की स्थापना बोलपुर के पास की। बाद में इसका नाम उन्होंने शान्तिनिकेतन रखा।

विश्व भारती- इसकी स्थापना 1921ई० में की गई |

श्रीनिकेतन- श्रीनिकेतन कि स्थापना 1924ई० में की
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शिक्षा सत्र- शिक्षा सत्र की स्थापना 1924ई० में की |


रबींद्रनाथ टैगोर का निधन-


एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने, अपने प्रकाश से, सर्वत्र रोशनी फैलाई | भारत के बहुमूल्य रत्न मे से, एक हीरा जिसका तेज चहु दिशा मे फैला. जिससे भारतीय संस्कृति का अदभुत साहित्य, गीत, कथाये, उपन्यास , लेख प्राप्त हुए| ऐसे व्यक्ति का निधन 7 अगस्त 1941 को कोलकाता मे हुआ | टैगोर एक ऐसा व्यक्तित्व है जो, मर कर भी अमर है |

01 मई 2020

WORLD ASTRONOMY DAY

खगोल विज्ञान दिवस (ASTRONOMY DAY)

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खगोल विज्ञान किसे कहते हैं ?


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WORLD ASTRONOMY DAY

खगोल का अर्थ आकाशमंडल होता  है| खगोल शास्त्र, एक ऐसा शास्त्र है जिसके अंतर्गत पृथ्वी और उसके वायुमण्डल के बाहर होने वाली घटनाओं का अवलोकन, विश्लेषण तथा उसकी व्याख्या (explanation) की जाती है। यह वह अनुशासन है जो आकाश में अवलोकित की जा सकने वाली तथा उनका समावेश करने वाली क्रियाओं के आरंभ, बदलाव और भौतिक तथा रासायनिक गुणों का अध्ययन करता है। खगोलिकी ब्रह्मांड में अवस्थित आकाशीय पिंडों का प्रकाश, उद्भव, संरचना और उनके व्यवहार का अध्ययन खगोलिकी का विषय है। अब तक ब्रह्मांड के जितने भाग का पता चला है उसमें लगभग 19 अरब आकाश गंगाओं के होने का अनुमान है और प्रत्येक आकाश गंगा में लगभग 10 अरब तारे हैं। आकाश गंगा का व्यास लगभग एक लाख प्रकाशवर्ष है। हमारी पृथ्वी पर आदिम जीव 2 अरब साल पहले पैदा हुआ और आदमी का धरती पर अवतण 10-20 लाख साल पहले हुआ। पश्चिमी संस्कृति में गैलीलियो नामक खगोल विज्ञानी को आधुनिक खगोलशास्त्र का पिता माना जाता है। हालाँकि कुछ लोग यह नाम कॉपरनिकस को देते हैं।



खगोल विज्ञान दिवस




खगोल विज्ञान को अंग्रेजी में  ASTRONOMY कहा जाता है तथा इसे ज्योतिषी शास्त्र में (नक्षत्र विद्या) भी कहा जाता है वर्ल्ड एस्ट्रोनॉमी डे या विश्व खगोल विज्ञान दिवस प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला इवेंट है जिसे दुनिया भर में बसंत और पतझड़ के मौसम में वर्ष में दो बार मनाया जाता है | इस बार 2 मई और 26 सितम्बर को ये मनाया जायेगा | एस्ट्रोनॉमी डे को मनाने के पीछे उद्देश्य आम जनता को खगोल विज्ञान से परिचय करवाना, खगोल विज्ञान के महत्व को जन-जन तक पहुँचाना है इसके अंतर्गत सामान्य लोग, शौकिया खगोल शास्त्री,  अंतरिक्ष विज्ञान में दिलचस्पी रखने वाले  लोग मिलते हैं और अंतरिक्ष विज्ञान के रोचक और अनोखे प्रयोग करते हैं |


खगोल विज्ञान में रूचि रखने वालों के लिए आभासी टेलिस्कोप के 

दवारा ब्रह्माण्ड का दर्शन किया जा सकता है


वर्ल्ड एस्ट्रोनॉमी डे का इतिहास – History of World Astronomy


वर्ल्ड एस्ट्रोनॉमी डे विश्व खगोल विज्ञान दिवस की शुरुआत सन 1973 में कैलीफोर्निया अमेरिका में हुई| इसकी शुरुआत एस्टॉनोमिकल एसोसिएशन  आफ नार्थन कैलिफोर्निया के अध्यक्ष Doug Berger ने  की थी, उन्होंने सोचा की अंतरिक्ष विज्ञान में दिलचस्पी रखने वाले  सभी लोग अंतरिक्ष वेधशाला तक सफर करके नहीं जा सकते इसके लिए छोटे-छोटे टेलीस्कोप्स उनके शहर में ही उपलब्ध कराए जाने चाहिए जिससे वह वर्ष में दो बार आकाश का अध्ययन कर सकें इसके लिए उन्होंने शहरों, शॉपिंग मॉल्स गली के कोनो आदि में छोटे-छोटे टेलीस्कोप लगवाए| उनका यह आइडिया काम कर गया,  लोगों ने वर्ल्ड एस्ट्रोनॉमी डे में काफी दिलचस्पी दिखाई,  पहले जिन लोगों ने टेलीस्कोप से आकाश का अध्ययन नहीं किया था उन्होंने भी इसका उपयोग किया और उनकी दिलचस्पी से बढ़ गई,  अब यह लोग जानना चाहते थे कि ऑब्जर्वेटरी में लगे बड़े बड़े टेलिस्कोप से आकाश किस प्रकार दिखाई देता है इसके लिए उन्होंने सबसे पास स्थित ऑब्जर्वेटरी में जाना शुरू किया इससे जनता की भीड़ एस्ट्रोनॉमी क्लब और एस्ट्रोनॉमी ऑब्जर्वेट्रीज में आने लगी| अमेरिका में सफल होने के बाद इस कांसेप्ट को दुनिया के दूसरे देशों में भी अपना लिया गया दुनिया भर में स्कूल, कॉलेज तथा एस्ट्रोनॉमी क्लब प्रतिवर्ष दो बार एस्ट्रोनॉमी डे  पर कई इवेंट आयोजित करते हैं |

30 अप्रैल 2020

मजदूर दिवस

अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस



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Labour Day

बिना मजदूर के विकास की काल्पना नहीं की जा सकती आज हम अपने आस पास जो कुछ भी निर्माण देख रहे है उन सब निर्माण के पीछे सैकड़ों मजदूरों का श्रम छुपा हुआ होता है जो जाहिरी तौर पर तो हमें नजर नहीं आता है |लेकिन सच्चाई ये है कि बिना मजदूर के मेहनत के हमारी दुनिया इतनी खुबसूरत कभी नहीं हो सकती थी हम इतना विकास नहीं कर सकते थे | मजदूर वो है जो अपना श्रम बेच कर पूंजीपतियों को जीवन के हर एश्वर्य और वैभव को प्राप्त करने का सामर्थ प्रदान करता है | मजदूर नींव कि ईट कि मानिंद अदृश्य रहता है और पूंजीपति गगनचुम्बी इमारतों के शिखर पर लगे प्रकाश पुंज कि तरह चमकता रहता है| हमारे समाज में मजदूरों को आज भी वो सम्मान नहीं मिल पाया है जिस के वो हक़दार हैं| ये हम सब जानते हैं कि मजदूर हमारे समाज का वह हिस्सा है जिसपर समस्त आर्थिक उन्नति टिकी हुई हैl वर्तमान समय के मशीनी युग में भी उनकी महत्ता कम नहीं हुई है | उदाहरण के लिए, उद्‌योग, व्यापार, कृषि, भवन निर्माण, पुल एवं सड़कों का निर्माण आदि समस्त क्रियाकलापों में मजदूरों के श्रम का योगदान महत्त्वपूर्ण होता है | मजदूर अपना श्रम बेचकर न्यूनतम मजदूरी प्राप्त करता है। इसीलिए अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संघ को बढ़ावा देने के लिये मजदूर दिवस को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता हैl पारंपरिक तौर पर इसको यूरोप में गर्मी के अवकाश के रूप में घोषित किया गया था, इसीलिए पूरे विश्व में 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस” मनाया जाता है |


विश्व में मजदूर दिवस की उत्पत्ति



1 मई 1886 में अमेरिका के सभी मजदूर संघ साथ मिलकर ये निश्चय करते है कि वे 8 घंटो से ज्यादा काम नहीं करेंगें, जिसके लिए वे हड़ताल कर लेते है | इस दौरान श्रमिक वर्ग से 10-16 घंटे काम करवाया जाता था, साथ ही उनकी सुरक्षा का भी ध्यान नहीं रखा जाता था | उस समय काम के दौरान मजदूर को कई चोटें भी आती थी, कई लोगों की तो मौत हो जाया करती थी. काम के दौरान बच्चे, महिलाएं व् पुरुष की मौत का अनुपात बढ़ता ही जा रहा था, जिस वजह से ये जरुरी हो गया था, कि सभी लोग अपने अधिकारों के हनन को रोकने के लिए सामने आयें और एक आवाज में विरोध प्रदर्शन करें | इस हड़ताल के दौरान 4 मई को शिकागो के हेमार्केट में अचानक किसी आदमी के द्वारा बम ब्लास्ट कर दिया जाता है, जिसके बाद वहां मौजूद पुलिस अंधाधुंध गोली चलाने लगती है | जिससे बहुत से मजदूर व् आम आदमी की मौत हो जाती है | इसके साथ ही 100 से ज्यादा लोग घायल हो जाते है | इस विरोध का अमेरिका में तुरंत परिणाम नहीं मिला, लेकिन कर्मचारियों व् समाजसेवियों की मदद के फलस्वरूप कुछ समय बाद भारत व अन्य देशों में 8 घंटे वाली काम की पद्धति को अपनाया जाने लगा | तब से श्रमिक दिवस को पुरे विश्व में बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाने लगा, इस दिन मजदूर वर्ग तरह तरह की रेलियां निकालते व् प्रदर्शन करते है |


भारत में मजदूर दिवस की शुरुआत



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भारत में मजदूर दिवस कामकाजी लोगों के सम्‍मान में मनाया जाता है. भारत में लेबर किसान पार्टी ऑफ हिन्‍दुस्‍तान ने 1 मई 1923 को मद्रास में इसकी शुरुआत की थी | यह वह समय भी था जब लाल झंडा (इसकी नींव के बाद से इस्तेमाल किया जाने वाला दिन का प्रतीक) भारत में पहली बार इस्तेमाल किया गया था। हालांकि उस समय इसे मद्रास दिवस के रूप में मनाया जाता था |


मौजूदा दौर में मजदूरों के हालात


महात्मा गांधी कहते थे कि किसी भी देश का विकास उस देश के मेहनतकश मजदूरों और किसानों पर निर्भर करता है। अब देश का विकास तो धड़ल्ले से हो रहा है लेकिन देश के मजदूर आज भी बदहाली में जीवन बसर करने को मजबूर हैं। कहने को तो मजदूरों के संघर्ष आज भी होते हैं लेकिन उनमें वो धार नज़र नहीं आती। आज फिर पूंजीपति वर्ग मेहनतकश के शोषण से मोटा मुनाफा कमाने में जुटा है। नये-नये कानून पारित कर मजदूरों को संगठित होने पर पांबदियां लगाई जाने लगी हैं। आंदोलनों को तोड़ने के लिये साम दाम दंड भेद जितने भी हथियार अपनाये जाने चाहियें अपनाये जा रहे हैं। मजदूर भी खेमों में बंटा है जिस कारण उसकी ताकत कमजोर हुई है। जहां मजदूर संगठित हैं वहां फिर भी वे अपने हकों के लिये आवाज़ उठा लेते हैं लेकिन असंगठित क्षेत्र के मजदूर तो शोषण के लिये अभिशप्त हैं।

Annual report of work done for environmental protection in the school

  विद्यालय में पर्यावरण संरक्षण के लिए किए जाने वाले कार्यों की वार्षिक रिपोर्ट -  अपने विद्यालय में पर्यावरण संरक्षण के लिए किए जाने वाले क...