20 नवंबर 2020

Revenue terminology in hindi in india raajasv shabdaavalee

 राजस्व शब्दावली - राजस्व भाषा की जानकारियों का संकलन

Land and revenue terminology in india



1 आबादी देह - गाँव का बसा हुआ क्षेत्र ।

2 मौजा - ग्राम

3 हदबस्त –तहसील  में गाँव का सिलसिलावार नम्बर ।

4 मौजा बेचिराग - बिना आबादी का गॉव ।

5 मिसल हकीयत - बन्दोबस्त के समय  विस्तारपूर्वक तैयार की गई जमाबन्दी ।

6 जमाबन्दी - भूमि की मलकियत व बोने के अधिकारों की पुस्तक ।

7 इन्तकाल -मलकियत की तबदीली का आदेश ।

8 खसरा गिरदावरी- खातेवार मलकियत,बोने व लगान का रजिस्टर ।

9 लाल किताब - गांव की भूमि से सम्बन्धित पूर्ण जानकारी देने वाली पुस्तक ।

10 शजरा नसब- भूमिदारों की वंशावली।

11 खाका  - प्रारूप

12 पैमाईश - भूमि का नापना ।

13 गज - भूमि नापने का पैमाना ।

14 अडडा -जरीब की पड़ताल करने के लिए भूमि पर बनाया गया माप ।

15 जरीब - भूमि नापने की 10 कर्म लम्बी लोहे की जंजीर ।

16 गठठा - 57.157 ईंच जरीब का दसवां भाग ।

17 झलार - नदी नाले से पानी देने का साधन

18 कारगुजारी - प्रगति रिपोर्ट

19 झण्डी - लाईन की सीधाई के लिए 12 फुट का बांस ।

20 फरेरा- दूर से झण्डी देखने के लिए बांस पर बंधा तिकोना रंग बिरंगा कपड़ा ।

21 सूए -पैमाईश के लिए एक फुट सरिया ।

22 पैमाना पीतल -म्सावी बनाने के लिए पीतल का बना हुआ इंच ।

23 मुसावी- मोटे कागज पर खेतों की सीमायें दर्शाने वाला नक्शा ।

24 शजरा - खेतों की सीमायें दिखाने वाला नक्शा |

25 शजरा किस्तवार - टरैसिंग क्लाथ या टरैसिंग पेपर पर बना हुआ खेतों का नक्शा

26 शजरा पार्चा- कपड़े पर बना खेतों का नक्शा ।

27 अक्स शजरा -शजरे की नकल (प्रति)

28 फिल्ड बुक - खेतों के क्षेत्रफल की विवरण पुस्तिका ।

29 जमां - भूमि कर

30 मुरब्बा- 25 किलों की समूह यानि 200 कनाल

31 मुस्ततील - 25 एकड़ का समूह यानि 200 कनाल

32 इस्तखराज -नम्बर की चारों भुजाओं की लम्बाई व चौडाई क्षेत्रफल निकालना

33 रकबा- खेत का क्षेत्रफल

34 किस्म जमीन - भूमि की किस्म

35 जमीन सफावार - खेतों का पृष्ठवार जोड

36 गोत- वंश का गोत्र

37 मिजान कुलदेह- गाँव के कुल क्षेत्रफल का जोड़

38 जोड़  किस्मवार - गाँव की भूमि का किस्मवार जोड़

39 गोशा -  खेत का हिस्सा

40 ततीमा - खेत का बांटा गया भाग

41 व्तर -  कर्ण

42 बिसवांसी - 57.157 ईंच कर्म का वर्ग

43 बिसवा - 20 बिसवांसी

44 बिघा -20 बिसवा

45 मेला - 9 सरसाही बारबर 30-1@4 वर्ग गज त्र1@20

46 क्नाल 20 मरले 605त्र वर्ग गज त्र1@8 एकड़

47 एकड़  - एक किला (40 कमर 36 करम) 4 बीघे- 16 बिसवेत्र(4840 वर्ग गज)

48 तरमीम - बदल देना

49 मशरिक  - पूर्व

50 मग़रिब  – पश्चिम

51 जनूब - दक्षिण

52 शुमाल  - उत्तर

53 खेवट -  मलकियत का विवरण

56 खतौनी -   कशतकार का विवरण

55 पट्टी तरफ ठोला - गाँव में मालकों का समूह

56 गिरदावर(कानूनगो) - पटवारी के कार्य का निरीक्षण करने वाला

57 दफतर कानूनगो -  तहसील कार्यालय का कानूनगो |

58 नायब दफतर कानूनगो - सहायक दफतर कानूनगो |

60 सदर कानूनगो- जिला कार्यालय का कानूनगो।

61 वासल वाकी नवीस- राजस्व विभाग की वसूली का लेखा रखने वाला कर्मचारी |

62 मालिक -  भूमि का भू-स्वामी

63 कास्तकार- भूमि को जोतने वाला एवं कास्त करने वाला ।

64 मालक कब्जा - मालिक जिसका शामलात में हिस्सा न हो ।

65 मालक कामिल - मालिक जिसका शामलात में हिस्सा हो

66 शामलात - सांझी भूमि

67 शामलात देह - गाँव की शामलात भूमि

68 शामलात पाना - पाने की शामलात भूमि

69 शामलात पत्ती - पत्ती की शामलात भूमि

70 शामलात ठौला -ठोले की शामलात भूमि जोतने वाला जो मालिक

71 मुजारा- भूमि को जोतने वाला जो मालिक को लगान देता हो ।

72 मौरूसी - बेदखल न होने वाला व लगान देने वाला मुजारा |

73 गैर मौरूसी -  बेदखल होने योग्य कास्तकार |

74 छोहलीदार - जिसको भूमि दान दी जावे ।

75 नहरी - नहर के पानी से सिंचित भूमि ।

76 चाही नहरी-  नहर व कुओं द्वारा सिंचित भूमि |

78 चाही - कुएं द्वारा सिंचित भूमि

79 चाही मुस्तार - खरीदे हुए पानी द्वारा सिंचितभूमि ।

80 बरानी- वर्षा पर निर्भर भूमि ।

81 आबी - नहर व कुएं के अलावा अन्य साधनों से सिंचित भूमि ।

82 बंजर जदीद - चार फसलों तक खाली भूमि ।

83 बंजर कदीम - आठ फसलों तक खाली पड़ी भूमि ।

84 गैर मुमकिन - कास्त के अयोग्य भूमि ।

85 नौतौड - कास्त अयोग्य भूमि को कास्त योग्य बनाना ।

86 क्लर  - शोरा या खार युक्त भूमि ।

87 चकौता - नकद लगान ।

88 सालाना - वार्षिक

90 बटाई - पैदावार का भाग ।

91 तिहाई - पैदावार का 1/3 भाग ।

92 निसफी- पैदावार का 1/2 भाग।

93 पंज दुवंजी- पैदावार का 2/5 भाग ।

94 चहाराम - पैदावार का 1/4 भाग ।

95 तीन चहाराम -  पैदावार का 3/4 भाग

97 मुन्द्रजा- पूर्वलिखित (उपरोक्त)

98 मजकूर - चालू

99 राहिन - गिरवी देने वाला।

100 मुर्तहिन - गिरवी लेने वाला ।

101 बाया - भूमि बेचने वाला ।

102 मुस्तरी - भूमि खरीदने वाला ।

103 वाहिब -उपहार देने वाला ।

104 मौहबईला - उपहार लेने वाला ।

105 देहिन्दा - देने वाला।

106 गेरिन्दा - लेने वाला ।

107 लगान - मुजारे से मालिक को मिलने वाली राशि  या जिंस |

108 पैमाना हकीयत -शामलात भूमि में मालिक का अधिकारी ।

109 सरवर्क - आरम्भिक पृष्ठ ।

110 इण्डैक्स- पृष्ठ वार सूची ।

111  नक्शा कमीबेशी - पिछली जमाबन्दी के मुकाबले में क्षेत्रफल की कमी या वृद्धि |

112 वाजिबुलअर्ज- ग्रामवासियों के ग्राम सम्बन्धी रस्में रीति रिवाज ।

113  विरासत, उत्तराधिकार ।

114  मुतवफी – मृतक |

115 हिब्बा - उपहार ।

116 बैयहकशुफा - भूमि खरीदने का न्यायालय द्वारा अधिकार ।

117 रहन बाकब्जा - कब्जे सहित गिरवी ।

118 आड रहन - बिला कब्जा गिरवी ।

127 रहन दर रहन - मुर्तहिन द्वारा कम राशि में गिरवी रखना ।

128 सैंकिण्ड रहन - राहिन द्वारा मुर्तहिन के ईलावा

129 फकुल रहन - गिरवी रखी भूमि को छुड़ा लेना |

 130 तबादला - भूमि के बदले भूमि लेना ।

131  बैय - जमीन बेच देना

132 पडत सरकार - राजस्व रिकार्ड रूम में रखी जाने वाली प्रति ।

133 पडत पटवार - रिकार्ड की पटवारी के पास रखी जाने वाली प्रति ।

134 मुसन्ना- असल रिकार्ड के स्थान पर बनाया जाने वाला रिकार्ड ।

135 फर्द - नकल

136 फर्द बदर -राजस्व रिकार्ड में हुई गलती को ठीक करना।

137 मिन - भाग

138 गिरदावरी - खेतों का फसलवार निरीक्षण ।

139 जिंसवार - फसलवार जिंसों का जोड़ |

140 फसल खरीफ - सावन की फसल |

141  खराबा – प्राकृतिक आपदा से खराब हुई फसल ।

142 फसल रबी – आसाढ़ की फसल ।

143 पुख्ता औसत झाड -  पैदावार के अनुसार पक्की फसल |

144 साबिक - भूतपूर्व, पूर्व,पुराना ।

145 हाल - वर्तमान, मौजूदा ।

146 बदस्तूर - जैसे का तैसा (पूर्ववत)

147 तकावी - फसल ऋण ।

148 महकूकी -काटकर दोबारा लिखना |

149 मसकूकी - बिना काटे पहले लेख पर दोबारा लिखना |

150 बुरजी- सरवेरी सर्वेक्षण का पत्थर

151 चक तशखीश - बन्दोबस्त के दौरान भूमि कीपैदावार के अनुसार तहसील की भूमि का निरधारण |

152 दो फसली - वर्ष में दो फसलें उत्पन्न करने वाली भूमि |

153 मेण्ड - खेत की सीमा |

154 गोरा देह भूमि - गाँव के साथ लगती भूमि |

155 हकदार - मालिक भूमि |

156 इकरारनामा - आपसी फैसला

157 खुशहैसियत - अच्छी हालत |

158 महाल - ग्राम

159 कलां – बड़ा

160 खुर्द – छोटा

161 जदीद - नया

162 मालगुजारी – भूमिकर |

163 दसतक- राईट आफ डिमाण्ड

164 नीलाम- खुली बोली द्वारा बेचना ।

165 बिला हिस्सा- जिसमें भाग न हो ।

166 मिन जानिब- की ओर से ।

167 बनाम- के नाम ।

168 जलसाआम- जनसभा ।

169 बशनाखत- की पहचान पर ।

170 पिसर या वल्द- पुत्र

171 दुखतर- सुपुत्री

172 वालिद- पिता

173 वालदा- माता

174 बेवा- विधवा

175 वल्दीयत- पिता का नाम

176 हमशीरा- बहन

177 हद- सीमा

178 हदूद- सीमायें

179 सेहहदा- तीन गॉंवों की एक स्थान पर मिलने वाली सीमाओं पर पत्थर

180 बखाना कास्त- कास्त के खाने में दर्ज ।

181 सकूनत- निवास स्थान

sinhasan hil uthe rajvanshon ne bhukati tani thi khub ladi mardani wo to jhansi wali rani thi

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भूकुटी तानी थी


sinhasan hil uthe rajvanshon ne bhukti tani thi khub ladi mardani wo to jhansi wali rani thi
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खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी


सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने  भूकुटी तानी थी,

बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,

गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,

दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

 

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,

लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,

नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,

बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।

 

वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,

देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,

नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,

सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़।

 

महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,

ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,

राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,

सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आई थी झांसी में।

 

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,

किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,

तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,

रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

 

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।


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बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,

राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,

फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,

लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।

 

अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,

व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,

डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,

राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।

 

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,

कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,

उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात?

जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।

 

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

रानी रोईं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,

उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,

सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,

'नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'

 

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।


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कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,

वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,

नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,

बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।

 

हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,

यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,

झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,

मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी,

 

जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,

नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,

अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,

भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।

 

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,

जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,

लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,

रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में।

 

ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,

घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,

यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,

विजई रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।

 

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

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विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,

अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,

काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,

युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

 

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,

किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,

घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,

रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।

 

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,

मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,

अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,

हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता-नारी थी,

 

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,

यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,

होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,

हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।


तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।


सुभद्रा कुमारी चौहान 

03 नवंबर 2020

Salaam us par ki jisne bekason ki dastgiri ki Salaam us par ki jisne baadshahi me faqiri ki lyrics in hindi

सलाम उस पर कि जिसने बेकसों की दस्तगीरी की 



Salaam us par ki jisne bekason ki dastgiri ki Salaam us par ki jisne baadshahi me faqiri ki lyrics in hindi
सलाम उस पर कि जिसने बेकसों की दस्तगीरी की



सलाम उस पर कि जिसने बेकसों की दस्तगीरी की,

सलाम उस पर कि जिसने, बादशाही में फ़क़ीरी की,

सलाम उस पर कि असरारे, मोह़ब्बत जिसने समझाये,

सलाम उस पर कि जिसने ज़ख्म खा कर फूल बरसाये,

सलाम उस पर कि जिसने ख़ून के प्यासों को क़बाए दीं,

सलाम उस पर कि जिसने गालियाँ सुन कर दुआएं दी,

सलाम उस पर कि जिसका ज़िक्र है सारे वज़ाइफ़ में,

सलाम उस पर हुआ मजरूह जो बज़ार-ए- ताइफ में,

सलाम उस पर वतन के लोग जिसको तंग करते थे,

सलाम उस पर कि घर वाले भी जिससे जंग करते थे,

सलाम उस पर कि जिसके घर में चांदी थी न सोना था,

सलाम उस पर कि टूटा बोरिया जिसका बिछोना था,

सलाम उस पर जो सच्चाई की ख़ातिर दुख उठाता था,

सलाम उस पर जो भूखा, रह के औरों को खिलाता था,

सलाम उस पर जो उम्मत के लिये रातों को रोता था,

सलाम उस पर जो फ़र्शे-खाक़ पर जाड़े में सोता था,

सलाम उस पर कि जिसने झोलिया भर दीं फ़कीरों की,

सलाम उस पर कि मश्के, खोल दी जिसने असीरों की,

सलाम उस पर कि फ़िज़ा जिसने ज़माने की बदल डाली,

सलाम उस पर कि जिसने कुफ़्र की क़ुव्वत कुचल डाली,

सलाम उस पर कि जिसने शिर्क के पुर्ज़े उड़ा डाले,

सलाम उस पर कि जिसने नक़्श बातिल के मिटा डाले,

सलाम उस पर कि जिसने ज़िन्दगी के राज़ समझाए,

सलाम उस पर जो ख़ुद बद्र के मैदान में काम आये,

सलाम उस पर कि जिसने बेकसों की दस्तगीरी की,

सलाम उस पर कि जिसने बादशाही में फकीरी की


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Salaam us par ki jisne bekason ki dastgiri ki

Salaam us par ki jisne baadshahi me faqiri ki

Salaam us par ki asrare mohabbat jisne samjhaye

Salaam us par ki jisane jakhm kha kar phool barsaye

Salaam us par ki jisne khoon ke pyason ko kabayen di

Salaam us par ki jisne galiyan sun kar duwayen di

Salaam us par ki jiska zikr hai sare wajaif me

Salaam us par hua majrooh jo bajar-e-taif me

Salaam us par watan ke log jisko tang karte the

Salaam us par ki ghar wale bhi jisse jang karte the

Salaam us par ki jiske ghar me chandi thi na sona tha

Salaam us par ki tuta boriya jiska bichhona tha

Salaam us par jo sachchai kii khatir dukh uthata tha

Salaam us par jo bhukha rah ke auron ko khilata tha

Salaam us par jo ummat ke liye raton ko rota tha

Salaam us par jo farsh-e-khaaq par jaadon me sota tha

Salaam us par ki jisne jholiyan bhar di faqiron kee

Salaam us par ki mashke khol di jisne asiron kee

Salaam us par ki fiza jisne jamane ki badal daali

Salaam us par ki jisne kufra kee quwwat kuchal daali

Salaam us par ki jisne shirk ke purje uda dale

Salaam us par ki jisne naqshe batil ke mita dale

Salaam us par ki jisne zindagi ke raj samjhaye

Salaam us par jo khud badr ke maidaan me kaam aaye

Salaam us par ki jisne bekason ki dastgiri ki

Salaam us par ki jisne baadshahi me faqiri ki


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baar baar aati hai mujhko madhur yaad bachpan teri gaya le gaya tu jeevan ki sabse mast khusi meri subhadra kumari chouhan poet

बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी.... सुभद्रा कुमारी चौहान



baar baar aati hai mujhko madhur yaad bachpan teri gaya le gaya tu jeevan ki sabse mast khusi meri subhadra kumari chouhan poet
bachpan par kavita 


बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।

गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी।

 

चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।

कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?

 

ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?

बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी।

 

किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।

किलकारी किल्लोल मचाकर सूना घर आबाद किया।

 

रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे।

बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे।

 

मैं रोई, माँ काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया।

झाड़-पोंछ कर चूम-चूम कर गीले गालों को सुखा दिया।

 

दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे।

धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे।

 

वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई।

लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई।

 

लाजभरी आँखें थीं मेरी मन में उमँग रँगीली थी।

तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी।

 

दिल में एक चुभन-सी थी यह दुनिया अलबेली थी।

मन में एक पहेली थी मैं सब के बीच अकेली थी।

 

मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने।

अरे! जवानी के फंदे में मुझको फँसा दिया तूने।

 

सब गलियाँ उसकी भी देखीं उसकी खुशियाँ न्यारी हैं।

प्यारी, प्रीतम की रँग-रलियों की स्मृतियाँ भी प्यारी हैं।

 

माना मैंने युवा-काल का जीवन खूब निराला है।

आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहनेवाला है।

 

किंतु यहाँ झंझट है भारी युद्ध-क्षेत्र संसार बना।

चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना।

 

आ जा बचपन! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शांति।

व्याकुल व्यथा मिटानेवाली वह अपनी प्राकृत विश्रांति।

 

वह भोली-सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप।

क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?

 

मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी।

नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी।

 

'माँ ओ' कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आई थी।

कुछ मुँह में कुछ लिये हाथ में मुझे खिलाने लाई थी।

 

पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतुहल था छलक रहा।

मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा।

 

मैंने पूछा 'यह क्या लाई?' बोल उठी वह 'माँ, काओ'

हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से मैंने कहा - 'तुम्हीं खाओ'

 

पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया।

उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया।

 

मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ।

मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ।

 

जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया।

भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया।


........सुभद्रा कुमारी चौहान 


Annual report of work done for environmental protection in the school

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