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04 सितंबर 2021

Mujhko bulane walon ki umre nikal gai Lekin main tere ek ishare pe aagaya

मुझको बुलाने वालों कि उम्रें निकल गई लेकिन मैं तेरे एक इशारे पे आ गया 

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shayar munawwar rana



दरिया को जोम था कि मैं धारे पे आ गया

लेकिन मैं बच-बचा के किनारे पे आ गया


मुझको बुलाने वालों कि उम्रें निकल गई

लेकिन मैं तेरे एक इशारे पे आ गया


उसका तमाम हुश्न हमारी नज़र में है

कश्मीर सारा एक शिकारे पे आ गया


साँसों कि दूर टूट भी जाए तो गम नहीं

शुक्रे खुदा, मैं आखिरी पारे पे आ गया


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Dariya ko zom tha ki main dhare pe aagya

Lekin main bach-bacha ke kinare pe aagaya.


Mujhko bulane walon ki umra nikal gayi

Lekin main tere ek ishare pe aagaya.


Uska tamam husna hamari nazer mai hai

Kashmir saara ek shikare pe aagaya.


Saason ki dor toot bhi jaye to gum nahin

Shukre - Khuda, main aakhiri paare pe aagaya




poem on teachers day in hindi

गुरु पर दोहे

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गुरु मन में बैठत सदा, गुरु है भ्रम का काल ।

गुरु अवगुण को मेटता, मिटें सभी भ्रमजाल ।।




गीली मिट्टी अनगढ़ी, हमको गुरुवर जान ।

ज्ञान प्रकाशित कीजिये, आप समर्थ बलवान ।।




यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान ।

शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान ।।



गुरु बिन ज्ञान न होत है, गुरु बिन दिशा अजान ।

गुरु बिन इंद्रिय न सधें, गुरु बिन बढ़े न शान ।।



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गुरु ग्रंथ का सार है, गुरु है प्रभु का नाम ।

गुरु अध्यात्म की ज्योति, गुरु है चारों धाम ।।




शिष्य वही जो सीख ले, गुरु का ज्ञान अगाध ।

भक्तिभाव मन में रखे, चलता चले अबाध ।।



गुरु अमृत है जगत में, बाकी सब विषबेल ।

सतगुरु संत अनंत हैं, प्रभु से कर दें मेल ।




अंधकार से खींचकर, मन में भरे प्रकाश ।

ज्यों मैली चुनरी धुले, सोहत तन के पास ।।


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गुरु की कृपा हो शिष्य पर, पूरन हों सब काम ।

गुरु की सेवा करत ही, मिले ब्रह्म का धाम ।।




गुरु अनंत तक जानिए, गुरु की ओर न छोर ।

गुरु प्रकाश का पुंज है, निशा बाद का भोर ।।




गुरु तेरे उपकार का, कैसे चुकाऊं मैं मोल ।

लाख कीमती धन भला, गुरु हैं मेरे अनमोल ।।




गुरु कुम्हार शिष्य कुंभ है, गढ़ि – गढ़ि काढ़ै खोट ।

अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट ।।


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गुरु को सिर रखिये, चलिए आज्ञा माहिं ।

कहे कबीर ता दास को, तीन लोकों भय नाहिं ।।




गुरु सो ज्ञान जु लीजिये, सीस दीजिये दान ।

बहुतक भोंदू बहि गए, सखि जीव अभिमान ।।




सब धरती कागज करूँ, लेखनी सब बनराय ।

सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा ना जाए ।।




गुरु गोविन्द दोउ खड़े, काके लागूं पाय ।

बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय ।।


31 जुलाई 2021

ghalib jise kahte hain urdu ka hi shayar tha urdu pe sitam dha kar ghalib pe karam kyon hai

ग़ालिब जिसे कहते हैं उर्दू ही का शायर था


ghalib jise kahte hain urdu ka hi shayar tha urdu pe sitam dha kar ghalib pe karam kyon hai
sahir ludhianvi

जहां तक उर्दू का सवाल है, हम एक महत्त्वपूर्ण घटना का जिक्र करके उर्दुभाषियों की बेचैनी और उनके दर्द को पाठकों के सामने रखना चाहेंगे। बढ़ती दूरियां, गहराती दरार नामक अपनी पुस्तक में रफ़ीक़ जकारिया ने एक घटना का हवाला देते लिखा है, '1969 में फखरुद्दीन अली अहमद भारत सरकार को इस बात पर राजी करने में कामयाब हो गये कि मिर्ज़ा ग़ालिब की जन्म शताब्दी अखिल भारतीय स्तर पर मनायी जाये। परिणामस्वरूप, बंबई में एक विशाल आम समारोह आयोजित किया गया।। केंद्र और राज्य के अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने समारोह में हिस्सा लिया। उसमें भाग लेने वाले प्रमुख उर्दू लेखकों और शायरों में लोकप्रिय साहिर लुधियानवी भी थे। जब शांत, विनम्र साहिर अपने सामान्य गंभीर व्यक्तित्व के साथ अपनी रचना पढ़ने के लिए खड़े हुए तो तालियों की प्रचंड गड़गड़ाहट हुई, सभी ने बड़ी उम्मीद के साथ सुनना शुरू किया कि अब उर्दू कविता के शिखरपुरुष से मिर्ज़ा ग़ालिब को श्रद्धांजलि अर्पित करने वाली मार्मिक रचना सुनने को मिलेगी। लेकिन जब साहिर ने रचना पढ़नी शुरू की और पंक्ति दर पंक्ति पढ़ते गये तो सभी दंग रह गये, मंच पर बैठे मंत्री, अधिकारी धक् रह गये और विशाल जनसमुदाय उछल पड़ा। साहिर ने सुनाया 


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इक्कीस बरस गुज़रे आज़ादी-ए-कामिल को,

तब जाके कहीं हम को ग़ालिब का ख़्याल आया ।

तुर्बत है कहाँ उसकी, मसकन था कहाँ उसका,

अब अपने सुख़न परवर ज़हनों में सवाल आया ।

सौ साल से जो तुर्बत चादर को तरसती थी,

अब उस पे अक़ीदत के फूलों की नुमाइश है ।

उर्दू के ताल्लुक से कुछ भेद नहीं खुलता,

यह जश्न, यह हंगामा, ख़िदमत है कि साज़िश है ।

जिन शहरों में गुज़री थी, ग़ालिब की नवा बरसों,

उन शहरों में अब उर्दू बे नाम-ओ-निशां ठहरी ।

आज़ादी-ए-कामिल का ऎलान हुआ जिस दिन,

मातूब जुबां ठहरी, गद्दार जुबां ठहरी ।

जिस अहद-ए-सियासत ने यह ज़िन्दा जुबां कुचली,

उस अहद-ए-सियासत को मरहूमों का ग़म क्यों है ।

ग़ालिब जिसे कहते हैं उर्दू ही का शायर था,

उर्दू पे सितम ढा कर ग़ालिब पे करम क्यों है ।

ये जश्न ये हंगामे, दिलचस्प खिलौने हैं,

कुछ लोगों की कोशिश है, कुछ लोग बहल जाएँ ।

जो वादा-ए-फ़रदा, पर अब टल नहीं सकते हैं,

मुमकिन है कि कुछ अर्सा, इस जश्न पर टल जाएँ ।

यह जश्न मुबारक हो, पर यह भी सदाकत है,

हम लोग हक़ीकत के अहसास से आरी हैं ।

गांधी हो कि ग़ालिब हो, इन्साफ़ की नज़रों में,

हम दोनों के क़ातिल हैं, दोनों के पुजारी हैं

19 मई 2021

tere hote janam liya hota Koi Mujhsa Na Dusara Hota naat lyrics in hindi

तेरे होते जन्म लिया होता,  कोई मुझसा न दूसरा होता 

tere hote janam liya hota lyrics in hindi


तेरे होते जन्म लिया होता

कोई मुझसा न दूसरा होता


सांस लेता तू और मैं जी उठता

काश मक्का की मैं फिजा होता


हिजरतों में पड़ाव होता मैं

और तू कुछ देर को रुका होता

तेरे हुजरे के आस-पास कहीं

मैं कोई कच्चा रास्ता होता


बीच ताईफ बवक्ते संग जनी

तेरे लब पे सजी दुआ होता


किसी गजवा में जख्मी होकर मैं

तेरे क़दमों में जा गिरा होता


काश उहद में शरीक हो सकता

और बाक़ी न फिर बचा होता


तेरे पाकीज़ा ज़िन्दगी का मैं

कोई गुमनाम वाकिया होता


मैं कोई जंगजू-ए-अरब होता

और तेरे सामने झुका होता


मैं भी होता तेरा ग़ुलाम कोई

लाख कहता न मैं रिहा होता


सोचता हूँ मैं तब जन्म लेता

जाने फिर क्या से क्या हुआ होता

चाँद होता तेरे ज़माने का

फिर तेरे हुक्म से बटा होता


मुझपे पड़ती जो तेरी नजरे करम

आदमी क्या मैं मौजजा होता


आसमाँ होता अहदे नबवी का

तुझको हैरत से देखता होता


पेड़ होता खजूर का मैं कोई

जिस का फल तूने खा लिया होता


बच्चा होता ग़रीब बेवा का

सर तेरी गोद में छिपा लिया होता


रास्ता होता तेरे गुजरने का

और तेरा रास्ता देखता होता


बूत ही होता मैं खाने क़ाबा में

जो तेरे हाथ से फ़ना होता


मुझको खालिक बनता गार हसन

और मेरा नाम भी हिरा होता

तेरे होते जन्म लिया होता 

कोई मुझसा न दूसरा होता




Tere Hote Janam Liya Hota,

Koi Mujhsa Na Dusara Hota ..




Saans Leta Tu Aur Main Jee Uth'ta,

Kaash Makkah Ki Main Fiza Hota ..




Hijraton Mein Padao Hota Main,

Aur Tu Khuchh Der Ko Ruka Hota ..



Tere Hujray Ke Aass Pass Kahin,

Main Koi Kachcha Rastaa Hota ..




Beech Taif Bawaqt E Sang-Zani,

Tere Lab Pe Saji Dua Hota ..




Kisi Ghazwa Mein Zakhmi Ho Ker Main,

Tere Qadmon Mein Jaa Gira Hota ..



Kaash Uhad Mein Shareeq Ho Sakta,

Aur Baaqi Na Phir Bacha Hota ..



Teri Pakeeza Zindagi Ka Main,

Koi Gumnaam Waqeyaa Hota ..




Main Koi Jang-Juu E Arab Hota,

Aur Tere Saamnay Jhuka Hota ..




Main Bhi Hota Tera Ghulam Koi,

Laakh Kehta, Na Main Riha Hota ..




Sochta Hun Main Tab Janam Leta,

Jane fir Kya Se Kya Hua Hota ..



Chaand Hota Tere Zamanay Ka,

fir Tere Hukam Se Bata Hota ..



Mujh Pe Padti Jo Teri Chashm E Karam,

Aadmi Kya .. Main Maujzaa Hota ..



Asman Hota Ehad E Nabwi Ka,

Tujh Ko Hairat Se Dekhta Hota ..



Ped Hota Khajoor Ka Main Koi,

Jiss Ka fal Tu Ne Kha Liya Hota ..



Bachcha Hota Ghareeb Bewa Ka,

Sar Teri God Mein Chupa Liya Hota ..



Rasta Hota Tere Guzarne Ka,

Aur Tera Raasta Dekhta Hota ..




But Hi Hota Mein Khana E Kaaba Mein,

Jo Tere Haath Se Fana Hota ..




Mujh Ko Khaaliq Banata Ghaar 'Hassan'

Aur Mera Naam Bhi Hiraa Hota ..



Terey Hote Janam Liya Hota, 

Koi Mujhsa Na Dusra Hota .. !!

18 मई 2021

ye badshah ka hukm hai aur ek hukm ye bhi hai image par kavita

ये बादशाह का हुक्म है और एक हुक्म ये भी है, मेरे लिए जो है सजी वो सेज न ख़राब हो 


ye badshah ka hukm hai aur ek hukm ye bhi hai image par kavita


तुम्हारी अर्थियां उठे मगर ये ध्यान में रहे

मेरे लिए जो है सजी वो सेज न ख़राब हो

ये बादशाह का हुक्म है, और एक हुक्म ये भी है

भले कोई मरे मेरी इमेज न ख़राब हो



सुनो मेरे मंत्रियों सफेदपोश संत्रियों

जहाँ मिले जमीन खली रोप दो कपास तुम

कपास मिल में डाल कर बुनो सफ़ेद चादरें

गली गली में जाकर के फिर ढको हर एक लाश तुम

सवाल जो करे उसे नरक में तब तलक रखो

कहे न जब तलक मुझे कि आप लाजवाब हो

ये बादशाह का हुक्म है, और एक हुक्म ये भी है

भले कोई मरे मेरी इमेज न ख़राब हो

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खरीदो ड्रोन कैमरें खीचाऑ मेरी फोटोएं

दिखाओ उसको न्यूज पे करो मेरा प्रचार फुल

कहीं दिखे दाग़ तो ज़बान से ही पोछ दो

मगर ये ध्यान में रहे ज़बान में हो लार फुल

निकाल रीढ़ हर किसी भीड़ वो बनाओ तुम

हो जुल्म बेहिसाब पर कभी न इंक़लाब हो

ये बादशाह का हुक्म है, और एक हुक्म ये भी है

भले कोई मरे मेरी इमेज न ख़राब हो



जो सत्य है वो ही दिखे न लाग न लपेट हो

न कोई पेड न्यूज़ हो न झूट का प्रचार हो

काट दे जो जुल्म को जो चीर दे अनर्थ को

वो पत्रकार के कलम में ऐसे तेजधार हो

सलाख डाल कर , निकाल कर उछाल दो उसे

किसी की आँख में अगर ये बेहुदा सा ख्वाब हो

ये बादशाह का हुक्म है, और एक हुक्म ये भी है

भले कोई मरे मेरी इमेज न ख़राब हो


पुनीत शर्मा

Annual report of work done for environmental protection in the school

  विद्यालय में पर्यावरण संरक्षण के लिए किए जाने वाले कार्यों की वार्षिक रिपोर्ट -  अपने विद्यालय में पर्यावरण संरक्षण के लिए किए जाने वाले क...