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21 अप्रैल 2021

kab tak bojh sambhala jaye tu bhi rana ka vansaj hai fenk jahan tak bhala jaye kavi wahid ali wahid ki kavita

कब तक बोझ संभाला जाए, द्वंद्व कहां तक पाला जाए






लखनऊ के मशहूर कवि वाहिद अली वाहिद (59 वर्ष) का मंगलवार 20 अप्रैल को निधन हो गया । उन्हें तीन दिन से उन्हें बुखार था। इलाज के लिए उन्हें लोहिया अस्पताल ले जाया गया लेकिन न तो उन्हें स्ट्रेचर मिला न ही भर्ती किया गया । आखिरकार इलाज के अभाव में वाहिद ने इस फानी दुनिया को अलविदा कह दिया।

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kavi wahid ali wahid


कवि वाहिद अली वाहिद लखनऊ के निवासी थें । वे मूल रूप से कुशीनगर के रहने वाले थे, वे आवास विकास लखनऊ में कार्यरत थे । उनकी दर्जनभर से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और उन्हें कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित भी किया गया था । 

आज हम आपके बीच उन्हीं की प्रसिद्द कविता शेयर कर रहे हैं |



कब तक बोझ संभाला जाए

द्वंद्व कहां तक पाला जाए


दूध छीन बच्चों के मुख से

क्यों नागों को पाला जाए


दोनों ओर लिखा हो भारत

सिक्का वही उछाला जाए


तू भी है राणा का वंशज

फेंक जहां तक भाला जाए


इस बिगड़ैल पड़ोसी को तो

फिर शीशे में ढाला जाए


तेरे मेरे दिल पर ताला

राम करें ये ताला जाए


वाहिद के घर दीप जले तो

मंदिर तलक उजाला जाए


कब तक बोझ संभाला जाए

युद्ध कहां तक टाला जाए


तू भी राणा का वंशज है 

फेंक जहां तक भाला जाए

इसे भी पढ़ें- मैं इश्क लिखूं तुझे हो जाये 




Kab tak bojh sambhala jaye

Dwand kahan tak pala jaye



Doodh chhin bachchon ke mukh se

Kyon naagon ko pala jaye



Dono aur likha ho bharat

Sikka wahi uchhala jaye


Tu bhi rana ka vansaj hai

Fenk jahan tak bhala jaye



Is bigdel padosi ko to

Fir sheeshe me dhala jaye



Tere mere dil par tala

Ram kare ye tala jaye



Wahid ke ghar deep jale to

Mandir tak ujaala jaye



Kab tak bojh sambhala jaye

Yuddh kahan tak tala jaye



Tu bhi rana ka vansaj hai 

10 अक्टूबर 2020

main muflis hun mujhe duniya ka durbal likh diya jaaye bekal utsahi ki shayari

मैं मुफ़लिस हूँ मुझे दुनिया का दुर्बल लिख दिया जाए बेकल उत्साही 


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bekal utsahi 

मुहम्मद शफी अली खान (1 जून 1924 - 3 दिसंबर 2016) ये वो नाम है जिसे दुनिया बेकल उत्साही के रूप में जानती हैं, बेकल एक भारतीय कवि, लेखक और राजनीतिज्ञ थे | वे इंदिरा गांधी के करीबी और उच्च सदन राज्यसभा में सांसद थे। उन्हें कई राष्ट्रीय पुरस्कार मिले, जिनमें पद्म श्री और यश भारती शामिल हैं। 

बेकल उत्साही का जन्म 1 जून 1924 को हुआ था । वह राज्यसभा के पूर्व सदस्य थे। 1976 में उन्हें साहित्य में पद्मश्री पुरस्कार मिला। 1945 में देवा शरीफ के हजरत वारिस अली शाह की मजार की यात्रा के दौरान, शाह हाफिज प्यारे मियाँ ने कहा, "बेदम गया बेकल आया"। उस घटना के बाद मोहम्मद शफी खान ने अपना नाम "बेकल वारसी" के रूप में बदल लिया। 

1952 में जवाहरलाल नेहरू की अवधि के दौरान एक दिलचस्प घटना घटी, जिसके परिणामस्वरूप उत्साही का उद्भव हुआ। उस समय गोंडा में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का एक चुनावी कार्यक्रम था। बेकल वारसी ने नेहरू का उनकी कविता "किसान भारत का" के साथ स्वागत किया। नेहरू बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने कहा, "ये हमरा उस्ताही शायर है"। अंत में उन्हें साहित्य जगत में बेकल उत्साही के नाम से जाना जाता है  



मैं मुफ़लिस हूँ मुझे दुनिया का दुर्बल लिख दिया जाए



मैं मुफ़लिस हूँ मुझे दुनिया का दुर्बल लिख दिया जाए ।।

मेरी सदियों में कोई सुख भरा पल लिख दिया जाए ।।

 

बड़ी कृपा है गंगा जी की मुझ पर, मेरे हिस्से में,

नमक, माचिस, चना, इक मुट्ठी चावल लिख दिया जाए ।।

 

मेरे ही खुरदरे पैरों से घायल होते हैं पौधे,

मुनासिब हो तो इक कागज़ की चप्पल लिख दिया जाए ।।

 

मैं सब कुछ बेचकर इक माँग भरवा दूँ मगर पहले,

कफ़न मेरा, मेरी बेटी का आँचल लिख दिया जाए ।।

 

मेरी दुनिया मेरे ही गांव के मुखिया ने लूटी है

कहाँ जाऊँ, मेरा ठिकाना चंबल लिख दिया जाए।।

 

मेरी खेती को सूरज काट ले जाता है सदियों से

जो उसको बाँध ले इक ऐसा बादल लिख दिया जाए।।

 

मेरी बस्ती को शायद खूबसूरत शहर बनना है

मिरी मालिक मिरी बस्ती को जंगल लिख दिया जाए

 

ठिठुरती छाँव ताप्ती धूप मेरे अंग के साथी

मैं जी लूंगा मुझे मांगे का कम्बल लिख दिया जाए ।।


मेरे बागों के फल के रस से मैखाने लहकते हैं

मैं प्यासा हूँ मुझे जहरीला बोतल लिख दिया जाए।।

13 सितंबर 2020

Engineers Day Kyu Manaya Jata Hai Why Celebrate Engineers Day in Hindi

इंजीनियर्स डे क्यों मनाया जाता हैं

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Engineers Day Kyu Manaya Jata Hai Why Celebrate Engineers Day in Hindi

Pics credit by-  https://en|wikipedia|org/



भारत में अभियंता दिवस यानी इंजीनियर्स डे प्रतिवर्ष 15 सितंबर को मनाया जाता है। 15 सितंबर भारत के जाने-माने एवं प्रतिष्ठित सिविल इंजीनियर और राजनेता सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्मदिन है। उनका जन्मदिवस इंजीनियर्स डे के रूप में मनाया जाता है।


संक्षिप्त जीवन परिचय -


मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्म मैसूर (कर्नाटक) के कोलार जिले के चिक्काबल्लापुर तालुक में 15 सितंबर 1860 ई० को एक तेलुगु परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम श्रीनिवास शास्त्री तथा माता का नाम वेंकाचम्मा था। पिता संस्कृत के विद्वान थे। विश्वेश्वरैया 12 साल के थे जब उनके पिता का निधन हो गया| 

विश्वेश्वरैया ने प्रारंभिक शिक्षा जन्मस्थान से ही पूरी की। बचपन से ही पढ़ाई में बेहद होनहार विश्वेश्वरैया आगे की पढ़ाई के लिए बंगलूर के सेंट्रल कॉलेज में प्रवेश लिया। लेकिन यहां उनके पास धन का अभाव था। अत: उन्हें टयूशन करना पड़ा। 

विश्वेश्वरैया ने 1881 ई० में बीए की परीक्षा में अव्वल स्थान प्राप्त किया। इसके बाद मैसूर सरकार की मदद से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पूना के साइंस कॉलेज में दाखिला लिया। 

1883 ई० की एलसीई व एफसीई (वर्तमान समय की बीई उपाधि) की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करके अपनी योग्यता का परिचय दिया। इसी उपलब्धि के चलते महाराष्ट्र सरकार ने इन्हें नासिक में सहायक इंजीनियर के पद पर नियुक्त किया।


विश्वेश्वरैया जी ने क्या-क्या बनाया ? 



दक्षिण भारत के मैसूर को एक विकसित और समृद्धशाली क्षेत्र बनाने में उनकी अहम भूमिका रही है| सर एमवी के नाम से मशहूर विश्वेश्वरैया के प्रयासों से ही कृष्णाराज सागर बांध, भद्रावती आयरन एंड स्टील वर्क्स, मैसूर संदल ऑयल एंड सोप फैक्ट्री, मैसूर विश्वविद्यालय, बैंक ऑफ मैसूर का निर्माण हो पाया। 

इन्हें कर्नाटक का भगीरथ भी कहा जाता है| वो 32 साल के थे, जब उन्होंने सिंधु नदी से सुक्कुर कस्बे को पानी भेजने का प्लान तैयार किया, जो सभी इंजीनियरों को पसंद आया| 

सरकार ने सिंचाई व्यवस्था दुरुस्त बनाने के लिए एक समिति बनाई जिसके तहत उन्होंने एक नया ब्लॉक सिस्टम बनाया| 

उन्होंने स्टील के दरवाज़े बनाए जो बांध से पानी के बहाव को रोकने में मदद करते थे|

उनके इस सिस्टम की तारीफ़ ब्रिटिश अफ़सरों ने भी की| विश्वेश्वरैया ने मूसा और इसा नामक दो नदियों के पानी को बांधने के लिए भी प्लान बनाया| इसके बाद उन्हें मैसूर का चीफ़ इंजीनियर नियुक्त किया गया| 

वो उद्योग को देश की जान मानते थे, इसीलिए उन्होंने पहले से मौजूद उद्योगों जैसे सिल्क, चंदन, मेटल, स्टील आदि को जापान व इटली के विशेषज्ञों की मदद से और अधिक विकसित किया| 



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विश्वेश्वरैया के जीवन से जुड़े रोचक किस्से-


जंजीर किसने और क्यों खींची? - 


यह उस समय की बात है जब भारत में अंग्रेजों का शासन था। खचाखच भरी एक रेलगाड़ी चली जा रही थी। यात्रियों में अधिकतर अंग्रेज थे। एक डिब्बे में एक भारतीय मुसाफिर गंभीर मुद्रा में बैठा था। सांवले रंग और मंझले कद का वह यात्री साधारण वेशभूषा में था इसलिए वहां बैठे अंग्रेज उसे मूर्ख और अनपढ़ समझ रहे थे और उसका मजाक उड़ा रहे थे। पर वह व्यक्ति किसी की बात पर ध्यान नहीं दे रहा था। अचानक उस व्यक्ति ने उठकर गाड़ी की जंजीर खींच दी। तेज रफ्तार में दौड़ती वह गाड़ी तत्काल रुक गई। सभी यात्री उसे भला-बुरा कहने लगे। थोड़ी देर में गार्ड भी आ गया और उसने पूछा, ‘जंजीर किसने खींची है?’ उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, ‘मैंने खींची है।’ कारण पूछने पर उसने बताया, ‘मेरा अनुमान है कि यहां से लगभग एक फर्लांग की दूरी पर रेल की पटरी उखड़ी हुई है।’ गार्ड ने पूछा, ‘आपको कैसे पता चला?’ वह बोला, ‘श्रीमान! मैंने अनुभव किया कि गाड़ी की स्वाभाविक गति में अंतर आ गया है। पटरी से गूंजने वाली आवाज की गति से मुझे खतरे का आभास हो रहा है।’ गार्ड उस व्यक्ति को साथ लेकर जब कुछ दूरी पर पहुंचा तो यह देखकर दंग रहा गया कि वास्तव में एक जगह से रेल की पटरी के जोड़ खुले हुए हैं और सब नट-बोल्ट अलग बिखरे पड़े हैं। दूसरे यात्री भी वहां आ पहुंचे। जब लोगों को पता चला कि उस व्यक्ति की सूझबूझ के कारण उनकी जान बच गई है तो वे उसकी प्रशंसा करने लगे। गार्ड ने पूछा, ‘आप कौन हैं?’ उस व्यक्ति ने कहा, ‘मैं एक इंजीनियर हूं और मेरा नाम है डॉ॰ एम| विश्वेश्वरैया।’ नाम सुन सब स्तब्ध रह गए। दरअसल उस समय तक देश में डॉ॰ विश्वेश्वरैया की ख्याति फैल चुकी थी। लोग उनसे क्षमा मांगने लगे। डॉ॰ विश्वेश्वरैया का उत्तर था, ‘आप सब ने मुझे जो कुछ भी कहा होगा, मुझे तो बिल्कुल याद नहीं है।


चिर यौवन का रहस्य  -

भारत-रत्न से सम्मानित डॉ॰ मोक्षगुण्डम विश्वेश्वरैया ने सौ वर्ष से अधिक की आयु पाई और अन्त तक सक्रिय जीवन व्यतीत किया। एक बार एक व्यक्ति ने उनसे पूछा, 'आपके चिर यौवन का रहस्य क्या है?' डॉ॰ विश्वेश्वरैया ने उत्तर दिया, 'जब बुढ़ापा मेरा दरवाज़ा खटखटाता है तो मैं भीतर से जवाब देता हूं कि विश्वेश्वरैया घर पर नहीं है। और वह निराश होकर लौट जाता है। बुढ़ापे से मेरी मुलाकात ही नहीं हो पाती तो वह मुझ पर हावी कैसे हो सकता है?



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क्यों मानते हैं इंजीनियर्स डे-


इंजीनियरों को आधुनिक समाज की रीढ़ के रूप में देखा जाता है। इंजीनियर्स एक प्रकार के जादूगर होते है, वे अपनी रचनाओं से दुनिया को विस्मित और मोहित करते रहते हैं। एक इंजीनियर भविष्य के काम को आसान बनाने और परिपक्वता और क्षमता के उच्च स्तर तक पहुंचने के लिए उपकरण बनाता है। 

एक उन्नत तकनीकी दुनिया में, हमें अपने विचारों को वास्तविक मैं बदलने के लिए इंजीनियरों की आवश्यकता है। आज की दुनिया में इंजीनियरिंग एक बहुत ही महत्वपूर्ण अनुशासन है। 

वैज्ञानिक, इंजीनियर देश के विकास में अद्भुत भूमिका निभाते हैं। इसलिए वे सम्मान के हकदार होते हैं। 

जिस तरह शिक्षकों को सम्मानित करने के लिए टीचर्स डे, डॉक्टरों को सम्मानित करने के लिए डॉक्टर डे, माता-पिता को सम्मानित करने के लिए मदर्स डे, फादर्स डे मनाए जाते हैं, उसी तरह इंजीनियरों को उनके योगदान के लिए धन्यवाद देने और उनका सम्मान करने के लिए सभी इंजीनियरों को समर्पित एक दिन होना चाहिए। इसीलिए, इंजीनियरों को सम्मानित करने हेतु इंजीनियर डे मनाया जाता है। भारत में, भारत के एक महान इंजीनियर सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया को याद करने और सम्मान करने के लिए उनका जन्मदिवस 15 सितंबर को Engineers Day मनाया जाता है।







26 अगस्त 2020

who was bairam khan

 बैरम खान कौन था ?

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बैरम खाँ एक असाधारण सैन्य जनरल थे जिन्होंने मुगल सम्राट हुमायूं और उनके बेटे अकबर के लिए सेवा की और उनके राज्य का विस्तार करने में बहुत बड़ा योगदान दिया था। बैरम खां ने पानीपत की दूसरी लड़ाई में हेमू के खिलाफ अकबर की जीत के लिए उनका नेतृत्व किया। एक योग्य संरक्षक के रूप में, उन्होंने शत्रुतापूर्ण स्थितियों के दौरान अकबर को निर्देशित भी किया। बैरम खाँ मुगल साम्राज्य के प्रति तब तक वफादार रहे जब तक कि अकबर अपनी धाय माँ माहम अनगा के करीब नहीं आए, क्योंकि माहम अनगा ने दोनों के बीच मतभेद पैदा कर दिए थे। 

जब हुमायूं को इस्लाम शाह की मौत के बारे में खबर मिली, तो वह भारत पर आक्रमण करने के लिए उत्साहित हो गया। उसी समय पर, बैरम खाँ उनकी मदद के लिए आए थे। उन्होंने अफगानों को हराकर पंजाब पर विजय प्राप्त की थी और बिना किसी विपक्ष के दिल्ली पर कब्जा कर लिया था। मुगल साम्राज्य फिर से अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया क्योंकि उसमें बैरम खाँ का बहुत बड़ा योगदान था। जब अकबर केवल चौदह वर्ष का था तो हुमायूं की मृत्यु हो गई और बैरम खाँ ने अकबर का मार्गदर्शन करने की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली। उनके संरक्षण के तहत, अकबर ने मुगल साम्राज्य को बदलकर एक विशाल साम्राज्य में समेकित किया। इसके बाद हेमू विक्रमादित्य के तहत अफगान सेना ने आगरा और दिल्ली पर कब्जा कर लिया लेकिन बैरम की अगुआई में अकबर की सेना ने पानीपत (1556) की दूसरी लड़ाई में हेमू को हरा दिया और खोए गए क्षेत्रों पर पुनः कब्जा कर लिया। 

अकबर की धाय मां माहम मनगा के विचार अलग तरह के थे। वह अपने बेटे आधम खान के साथ-साथ खुद भी शासन करना चाहती थीं। उन्होंने बैरम खाँ को पद से हटाने के लिए अकबर को यह कहकर मजबूर कर दिया था कि वो अब बिल्कुल बूढ़े हो चुके हैं और कार्यभार संभालने में असमर्थ हैं। अकबर उनकी इस बात से सहमत थे और उन्होंने बैरम खाँ को हज करने के लिए मक्का की यात्रा की व्यवस्था कर दी। बैरम खां मक्का के लिए रवाना हो गए लेकिन रास्ते में उन्हें आधम खान द्वारा भेजी गई एक सेना मिली, जिसने उनसे कहा कि उन्हें पहरेदार के रूप में साथ जाने के लिए मुगल साम्राज्य द्वारा भेजा गया है। बैरम ने अपने आप को अपमानित महसूस किया और सेनाओं के खिलाफ विद्रोह की शुरुआत की। जिसके कारण बैरम को बन्दी बनाकर अकबर के राज-दरबार में पेश किया गया। अनादर करने की बजाय, अकबर ने उनका आदर और सम्मान किया और मक्का की उनकी उचित यात्रा को वित्त पोषित किया। हालांकि किस्मत ने बैरम खाँ के लिए कुछ और ही सोंच रखा था, जब वह खंभात के बंदरगाह शहर पहुंचे तो अफगानों, जिसके पिता को बैरम खाँ ने पांच साल पहले एक युद्धा में मार दिया गया था, ने उनकी पीठ पर छुरा भोंक दिया था। इसके बाद 31 जनवरी 1561 को बैरम खाँ की मृत्यु हो गई।


बैरम खान के बारे में तथ्य और जानकारी-


समयाकाल                       1517-1561

जन्म

बदख्शां में 1501

मृत्यु

31 जनवरी 1561, गुजरात

पत्नी

सलीमा सुल्तान बेगम

पुत्र

अब्दुल रहीम खान-ए-खाना

धर्म

शिया इस्लाम

बारे में

बैरम खाँ शीर्ष जनरलों के बीच एक सैन्य कमांडर, मुगल सेना का प्रमुख कमांडर, एक शक्तिशाली राजनेता और साथ-साथ मुगल सम्राट के दरबार में एक शासक था

सम्राट

अकबर

निष्ठावान

मुगल साम्राज्य

कमांड

मुगल सेना

सैन्य सेवा

बैरम ने 16 वर्ष की उम्र में बाबर के साम्राज्य की सेवा की थी और भारत की प्रारम्भिक मुगल विजय में सक्रिय रूप से भाग लिया था।

हुमांयू के तहत मुगल साम्राज्य की स्थापना में बैरम खान ने भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 

1556 में हुमायूं की मौत के बाद, बैरम खाँ राज्य-संरक्षक बन गए क्योंकि अकबर उस समय शासन करने के लिए बहुत छोटे थे।

 

पानीपत की दूसरी लड़ाई नवंबर 1556 में, मुगल सेनाओं का नेतृत्व बैरम खाँ ने किया था।

सलीमा सुल्तान

सलीमा सुल्तान बैरम की पत्नियों में से एक थीं। बैरम की मृत्यु के बाद अकबर ने उनसे विवाह किया।

मृत्यु

1560 में, अकबर ने बैरम को पदच्युत कर दिया और उन्हें मक्का की तीर्थ यात्रा पर जाने का आदेश दिया। यद्यपि, गुजरात में 31 जनवरी 1561 को बीच रास्ते में उनकी मृत्यु हो गई।

खानवा का युद्ध

17 मार्च 1527 को खानवा का युद्ध पानीपत की लड़ाई के बाद आगरा के लगभग 60 किलोमीटर पश्चिम में मुगल सम्राट बाबर द्वारा पहली बार लड़ा गया था।

घाघरा का युद्ध

1529 में घाघरा की लड़ाई मुगल साम्राज्य द्वारा सुल्तान महमूद लोदी द्वारा शासित पूर्वी अफगान संघ और सुल्तान नुसरत शाह द्वारा शासित बंगाल की सल्तनत के खिलाफ लड़ी गई

संभल की घेराबंदी

बाबर ने कासिम संभली द्वारा छीने गए एक जिले संभल को एक सेना भेजी।

पानीपत की लड़ाई (1556)

पानीपत की दूसरी लड़ाई 5 नवंबर 1556 को अकबर और सम्राट हेम चंद्र विक्रमादित्य (हेमू), हिंदू शासक के बीच लड़ी गई थी। अकबर के सेनापति और खान जमान और बैरम खां ने उनके लिए जीत सुनिश्चित की।

अंग्रेजी में किताबें

जानकी प्रकाशन द्वारा राजनीतिक जीवनी खान-ए-खाना बैरम खाँ

बैरम खां: सैनिक और प्रशासक

मुहम्मद बैरम खां का जीवन और उनकी उपलब्धियां

हिन्दी में किताबें

खान-ए-खाना नामा प्रतिभा प्रतिष्ठान



18 जुलाई 2020

BIOGRAPHY OF C V RAMAN IN HINDI

BIOGRAPHY OF C V RAMAN IN HINDI


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Chandrasekhara Venkata Raman
सीवी रमन आधुनिक भारत के एक महान वैज्ञानिक थे, जिन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में अपना अति महत्वपूर्ण योगदान दिया और अपनी अनूठी खोजों से भारत को विज्ञान की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान दिलवाई।

‘रमन प्रभाव’ (Raman Effect) सीवी रमन की अद्भुत और महत्वपूर्ण खोजों में से एक थी, जिसके लिए उन्हें साल 1930 में नोबेल पुरस्कार* से भी नवाजा गया था।

वहीं अगर सीवी रमन ने यह खोज नहीं की होती तो शायद हमें कभी यह पता नहीं चल पाता कि ‘समुद्र के पानी का रंग नीला क्यों होता है, और इस खोज के माध्यम से ही लाइट के नेचर और बिहेवियर के बारे में भी यह पता चलता हैं कि जब कोई लाइट किसी भी पारदर्शी माध्यम जैसे कि सॉलिड, लिक्वड या गैस से होकर गुजरती है तो उसके नेचर और बिहेवियर में बदलाव आता है।

वास्तव में उनकी इन खोजों ने विज्ञान के क्षेत्र में भारत को एक नई दिशा प्रदान की, जिससे देश के विकास को भी बढ़ावा मिला। इसके साथ ही आपको यह भी बता दें कि सीवी रमन को देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न और लेनिन शांति पुरस्कार समेत विज्ञान के क्षेत्र में उनके महत्वपूर्ण कामों के लिए तमाम पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है।

* 
कैसे हुई नोबेल पुरुस्कार कि शुरुवात कैसे हुई ? और किन-किन भारतीयों को ये पुरस्कार मिला है जानने के लिए क्लिक करें |


आइए जानते हैं भारत के महान वैज्ञानिक सीवी रमन (C V Raman) के बारे में –



आधुनिक भारत के महान वैज्ञानिक ‘भारत रत्न’ सी वी रमन – C V Raman Biography in Hindi
C. V. Raman

सीवी रमन की संक्षिप्त जीवन परिचय एक नजर में – CV Raman Information
पूरा नाम(Name)- सर चंद्रशेखर वेंकट रमन (सी.वी. रमन)
जन्म (Birth)- 7 नवंबर, 1888
जन्म स्थान (Birthplace)- तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु
पिता का नाम(Father Name)- चंद्रशेखर अय्यर
माता का नाम (Mother Name)- पार्वती अम्मल
पत्नी का नाम(Wife Name)- त्रिलोकसुंदरी
कार्य (Known for) रमन प्रभाव (Raman effect) की खोज,

भौतिक वैज्ञानिक
शिक्षा (Education) एम.एस.सी
मृत्यु (CV Raman Death)- 21 नवम्बर, 1970, बैंगलोर
उपलब्धियां (Awards)-  प्रकाश के प्रकीर्णन और रमन प्रभाव की खोज के लिए
नोबेल पुरस्कार, ‘भारत रत्न’, लेनिन पुरस्कार’
नागरिकता (Nationality) भारतीय


सीवी रमन का जन्म और प्रारंभिक जीवन – CV Raman Life History



दक्षिण भारत के तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली शहर में 7 नवम्बर 1888 को, भारत के महान वैज्ञानिक सीवी रमन एक साधारण से ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। वह चंद्रशेखर अय्यर और पार्वती अम्मल की दूसरी संतान थे। उनके पिता चंद्रशेखर अय्यर ए वी नरसिम्हाराव महाविद्यालय, विशाखापत्तनम, (आधुनिक आंध्र प्रदेश) में फिजिक्स और गणित के एक प्रख्यात प्रवक्ता थे।

वहीं उनके पिता को किताबों से बेहद लगाव था, उनके पिता को पढ़ना इतना पसंद था कि उन्होंने अपने घर में ही एक छोटी सी लाइब्रेरी भी बना ली थी, हालांकि आगे चलतक इसका फायदा सीवी रमन को मिला, इसके साथ ही वह पढ़ाई-लिखाई के माहौल में पले और बढ़े हुए, वहीं सीवी रमन ने छोटी उम्र से ही अंग्रेजी साहित्य और विज्ञान की किताबों से दोस्ती कर ली थी, और फिर बाद में उन्होंने विज्ञान और रिसर्च के क्षेत्र में कई कीर्तिमान स्थापित किए और भारत को विज्ञान के क्षेत्र में अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।


सीवी रमन की पढ़ाई – लिखाई एवं छात्र जीवन – CV Raman Education



सीवी रमन बेहद तेज बुद्धि के एक होनहार और प्रतिभाशील छात्र थे, जिनकी पढ़ाई में शुरुआत से ही गहरी रुचि थी, वहीं उनकी किसी चीज को सीखने और समझने की क्षमता भी बेहद तेज थी, यही वजह है कि उन्होंने महज 11 साल की उम्र में विशाखापत्तनम के सेंट अलोय्सिअस एंग्लो-इंडियन हाई स्कूल से अपनी 10वीं की परीक्षा पास की थी, जबकि 13 साल की उम्र में उन्होंने अपनी 12वीं की पढ़ाई पूरी कर ली थी।

सीवी रमन शुरुआत से ही पढ़ने में काफी अच्छे थे, इसलिए उन्होंने अपनी 12वीं की पढ़ाई स्कॉलरशिप के साथ पूरी की। इसके बाद उन्होंने साल 1902 में प्रेसीडेंसी कॉलेज मद्रास (चेन्नई) में एडमिशन लिया था, और वहां से साल 1904 में अपनी ग्रेजुएशन की डिग्री प्रथम श्रेणी के साथ हासिल की, इसके साथ ही सीवी रमन ने इस दौरान पहली बार फिजिक्स में ‘गोल्ड मेडल’ भी प्राप्त किया था।

इसके बाद उन्होंने साल 1907 में मास्टर डिग्री हासिल करने के लिए मद्रास यूनिवर्सिटी में ही एमएससी में एडमिशन लिया। आपको बता दें कि इस दौरान उन्होंने फिजिक्स को मुख्य विषय के तौर पर चुना, हालांकि वे इस दौरान क्लास में कम ही आते थे, क्योंकि उन्हें थ्योरी नॉलेज से ज्यादा लैब में नए-नए प्रयोग करना पसंद था, उन्होंने अपनी एमएससी की पढ़ाई के दौरान ही ध्वनिकी और प्रकाशिकी (Acoustics and Optics) के क्षेत्र में रिसर्च करनी शुरु कर दी थी।

वहीं उनके प्रोफेसर आर एस जोन्स भी उनकी प्रतिभा को देखकर काफी प्रभावित हुए और उन्होंने सीवी रमन को उनकी रिसर्च को ‘शोध पेपर’ के रुप में पब्लिश करवाने की सलाह दी, जिसके बाद नवंबर, साल 1906 में लंदन से प्रकाशित होने वाली ‘फ़िलॉसफ़िकल पत्रिका’ (Philosophical Magazine) में उनका शोध प्रकाश का ‘आणविक विकिरण‘ को प्रकाशित किया गया। आपको बता दें कि उस दौरान वह महज18 साल के थे।


सीवी रमन ने सहायक लेखपाल के तौर पर की अपने करियर की शुरुआत – CV Raman Career
मास्टर डिग्री हासिल करने के बाद सीवी रमन की अद्भुत प्रतिभा को देखते हुए कुछ प्रोफेसर्स ने उनके पिता से हायर स्टडीज के लिए उन्हें इंग्लैंड भेजने की भी सलाह दी, लेकिन सीवी रमन का स्वास्थ्य ठीक नहीं होने की वजह से वह आगे की पढ़ाई के लिए विदेश तो नहीं जा सके।



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लेकिन इसी दौरान ब्रिटिश सरकार की तरफ से एक परीक्षा आयोजित करवाई गई थी, जिसमें सीवी रमन ने भी हिस्सा लिया था और वह इस परीक्षा में सफल हुए और इसके बाद उन्हें सरकार के वित्तीय विभाग में नौकरी करने करने का मौका मिला, फिर कोलकाता में उन्होंने सहायक लेखापाल के तौर पर अपनी पहली सरकारी नौकरी ज्वाइन की।

हालांकि इस दौरान भी उन्होंने एक्सपेरिंमेंट और रिसर्च करना नहीं छोड़ा, वे कोलकाता में ‘इण्डियन एसोसिएशन फॉर कल्टिवेशन ऑफ साइंस’ लैब में अपनी खोज करते रहते थे, नौकरी के दौरान जब भी उन्हें समय मिलता था, वह अपनी खोज में लग जाते थे।

सरकारी नौकरी से इस्तीफा देकर कलकत्ता यूनिवर्सिटी में बने प्रोफेसर

हालांकि, विज्ञान के क्षेत्र में कुछ करने के उद्देश्य से उन्होंने साल 1917 में ही उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी छोड़कर ‘इण्डियन एसोसिएशन फॉर कल्टिवेशन ऑफ साइंस’ लैब में मानद सचिव के पद पर ज्वाइन कर लिया था। वहीं इसी साल उन्हें कलकत्ता यूनिवर्सिटी से भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर का भी जॉब ऑफर मिला था, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया और वे भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर के तौर पर कलकत्ता यूनिवर्सिटी में अपनी सेवाएं देने लगे, और अब वे अपनी रुचि के क्षेत्र में काम करके बेहद खुश भी थे।


इसके बाद साल 1924 में सीवी रमन को ‘ऑपटिक्स’ के क्षेत्र में उनके सराहनीय योगदान के लिए लंदन की ‘रॉयल सोसायटी’ की सदस्य बनाया गया।


‘रमन इफ़ेक्ट’ की खोज – Raman scattering or the Raman effect



‘रमन प्रभाव’ की खोज उनकी वो खोज थी, जिसने भारत को विज्ञान के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान दिलवाई। उन्होंने 28 फरवरी, साल 1928 को कड़ी मेहनत और काफी प्रयास के बाद ‘रमन प्रभाव’ की खोज की।

वहीं उन्होंने अगले ही दिन इसकी घोषणा कर दी थी। उनकी इस खोज से न सिर्फ इस बात का पता चला कि समुद्र का जल नीले रंग का क्यों होता है, बल्कि यह भी पता चला कि जब भी कोई लाइट किसी पारदर्शी माध्यम से होकर गुजरती है तो उसके नेचर और बिहेवियेर में चेंज आ जाता है।

प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका ‘नेचर’ ने इसे प्रकाशित किया। वहीं उनकी इस खोज को ‘रमन इफेक्ट’ (Raman effect) या ‘रमन प्रभाव’ का नाम दिया गया। इसके बाद वह एक महान वैज्ञानिक के तौर पर पहचाने जाने लगे और उनकी ख्याति पूरी दुनिया में फैल गई।

इसके बाद मार्च, साल 1928 में सीवी रमन ने गलोर स्थित साउथ इंडियन साइन्स एसोसिएशन में अपनी इस खोज पर स्पीच भी दी। इसके बाद दुनिया की कई लैब में उनकी इस खोज पर अन्वेषण होने लगे।

आपको बता दें कि उनकी इस खोज के द्धारा लेजर की खोज से अब रसायन उद्योग, और प्रदूषण की समस्या आदि में रसायन की मात्रा पता लगाने में भी मद्द मिलती है। सीवी रमन एक विज्ञान के क्षेत्र में वाकई में यह एक अतुलनीय खोज थी।

वहीं उन्हें इस खोज के लिए साल 1930 में भारत के प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘नोबेल पुरस्कार’ से भी नवाजा गया। वहीं सीवी रमन की इस महान खोज के लिए भारत सरकार ने 28 फरवरी के दिन को हर साल ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस’ के रुप में मनाने की भी घोषणा की।



इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस (आईआईएस) से रिटायरमेंट –



बेंगलौंर के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस में सीवी रमन को साल 1934 में डायरेक्टर बनाया गया था। हालांकि इस दौरान भी वे स्टिल की स्पेक्ट्रम प्रकृति, हीरे की संरचना, स्टिल डाइनेमिक्स के बुनियादी मुद्दे और गुणों समेत कई रंगदीप्त पदार्थो के प्रकाशीय आचरण पर खोज करते रहे।

इसके साथ ही आपको यह भी बता दें कि सीवी रमन को वाध्य यंत्र और संगीत में भी काफी रुचि थी, इसी वजह से उन्होंने तबले और मृदंगम के संनादी (हार्मोनिक) की प्रकृति की भी खोज की थी। इसके बाद साल 1948 में सी.वी रमन आईआईएस से रिटायर्ड हो गए थे।

रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट की स्थापना – Raman Research Institute

साल 1948 में सी.वी रमन ने वैज्ञानिक सोच और अनुसन्धान को बढ़ावा देने के लिए रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट, बैंग्लोर (Raman Research Institute, Bangluru) की स्थापना की थी।


सीवी रमन का पारिवारिक जीवन – 


सीवी रमन ने लोकसुंदरी नाम की कन्या को वीणा बजाते हुए सुना था, जिसे सुनकर वह मंत्रमुग्ध हो गए थे और इसके बाद उन्होंने लोकसुंदरी से विवाह करने की इच्छा जताई थी, वहीं इसके बाद परिवार वालों की रजामंदी से वे 6 मई साल 1907 को लोकसुंदरी अम्मल के साथ शादी के बंधन में बंध गए।

जिनसे उन्हें चंद्रशेखर और राधाकृष्णन नाम के दो पुत्रों की प्राप्ति हुई। वहीं आगे चलकर उनका बेटा राधाकृष्णन एक प्रसिद्ध खगोलशास्त्री के रुप में भी मशहूर हुआ था।

वैज्ञानिक सीवी रमन की महान उपलब्धियां – CV Raman Awards
भारत के महान वैज्ञानिक चंद्रशेखर वेंकट रमन को विज्ञान के क्षेत्र में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए कई पुरुस्कारों से भी नवाजा गया, जिनके बारे में हम आपको नीचे बता रहे हैं-

वैज्ञानिक सीवी रमन को साल 1924 में लन्दन की ‘रॉयल सोसाइटी’ का सदस्य बनाया गया।
सीवी रमन ने 28 फ़रवरी 1928 को ‘रमन प्रभाव’ की खोज की थी, इसलिए इस दिन को भारत सरकार ने हर साल ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस’ के रूप में बनाने की घोषणा की थी।
सीवी रमन ने भारतीय विज्ञान कांग्रेस की 16 वें सत्र की अध्यक्षता साल 1929 में की।

सीवी रमन को साल 1929 में उनके अलग-अलग प्रयोगों और खोजों के कई यूनिवर्सिटी से मानद उपाधि, नाइटहुड के साथ बहुत सारे पदक भी दिए गए।
साल 1930 में प्रकाश के प्रकीर्णन और ‘रमन प्रभाव’ जैसी महत्वपूर्ण खोज के लिए उन्हें भारत के उत्कृष्ठ और प्रतिष्ठित सम्मान नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया। आपको बता दें कि वे इस पुरस्कार को पाने वाले पहले एशियाई भी थे।
विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए साल 1954 में उन्हें भारत के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से भी सम्मानित किया गया।
साल 1957 में सीवी रमन को लेनिन शांति पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया।


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सीवी रमन का निधन – CV Raman Death



महान वैज्ञानिक सीवी रमन ने अपनी जिंदगी में ज्यादातर टाइम लैब में रहकर, नई-नई खोज और प्रयोग करने में व्यतीत किया। वह 82 साल की उम्र में भी रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट, बैंग्लोर में अपनी लैब में काम कर रहे थे, तभी अचानक उनको हार्ट अटैक आया, जिसकी वजह से वह गिर पड़ें और तभी 21 नवंबर साल 1970 को उन्होंने अपनी जिंदगी की आखिरी सांस ली।

भारत को विज्ञान के क्षेत्र में अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलवाने वाले वैज्ञानिक सी.वी. रमन भले ही आज हमारे बीच मौजूद नहीं हैं लेकिन उनकी महत्पूर्ण खोजें हमेशा हमारे बीच जिंदा रहेंगी, आज भी उनकी अद्भुत खोजों का इस्तेमाल बड़े स्तर पर किया जाता है।

उन्होंने जिस तरह कठोर प्रयास और कड़ी के दम पर ‘रमन प्रभाव’ जैसी खोज के माध्यम से विज्ञान के क्षेत्र में भारत को गौरव हासिल करवाया, वाकई हम सभी भारतीयों के लिए गर्व की बात है, वहीं सीवी रमन का व्यक्तित्व आने वाली कई पीढि़यों को ऐसे ही प्रेरित करता रहेगा।

ज्ञानी पंडित की टीम की तरफ से भारत के विज्ञान शिरोमणि, महान कर्मयोगी वैज्ञानिक सी.वी. रमन को हमारा शत-शत नमन। जय हिन्द, जय भारत |

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